शुक्रवार, 17 जून 2022

तुष्टिकरण किसी चीज का इलाज नहीं

 राजनितिक दल जन कल्याण के लिए बहुत सारी योजनाएं बनाते हैं। जनकल्याणकारी राज्य होने के नाते ऐसा करना सरकारों का दायित्व भी है।

इसी प्रकार सरकारों ने अलग अलग समय पर शिक्षा के लिए भी नितियां बनाई है।

उनमें से कुछ नितियां शिक्षा के सुधारीकरण में कारगर साबित हुई लेकिन कुछ नितियां शिक्षा पर और विभाग पर बोझ बन गई है।

अगर इसी तरह से चलता है तो मुझे लगता है मंजिल और उद्देश्य हमारे हाथों से फिसल जाएगा।

ये ठीक है नितियां बनानी पड़ती है और इनके बनाने से पहले संबंधित विभाग के विद्वानों से चर्चा भी होती है।

इस सबके बावजूद हमारी व्यवस्था में निति बनाकर छोड़ देना और उसका पुनरीक्षण न करना फिर बोझ बन जाता है।

कभी यदि पुनरावलोकन होता भी है तो देखा गया है कि यसमैन को ज्यादा महत्व मिलता है।

अधिक बार पालिसी को पायलट प्रोजेक्ट के रूप मे न परख कर सीधे ही लागू कर दिया जाता है, ये देखे बिना कि धरातल पर इसे लागू करने में कितनी कठिनाई होगी और इसका कितना क्रियान्वयन संभव है।

इसी प्रकार की पालिसी ,फिर पालिसी कम बोझ अधिक बन जाती है।

टैबलेट वितरण में इसी प्रकार की जल्दबाजी लगती है।

इसका पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर रिहर्सल किया जाना आवश्यक था। केवल 10% बच्चों को छोड़कर ये टैबलेट उनके और उनके परिवार के लिए मनोरंजन का साधन बन गए हैं।

इसी प्रकार बिना आवश्यकता के जबरदस्ती जब मुंह में कुछ ठूंसा जाता है तो तुष्टिकरण बन जाता है।

अब इस प्रकार की स्थिति के लिए बुजुर्गों ने कहा है कि बकरे की जान गई और मियां जी को स्वाद भी नहीं आया।

मुझे लगता नहीं कि सरकार को सभी को इस तरह टैबलेट देने की आवश्यकता नहीं थी।

जो बच्चे ग़रीब है आगे पढ़ना व बढ़ना चाहते हैं उनके लिए कोई दो तीन चरण की प्रतियोगिता रखे, जो बच्चा उसमें अच्छा प्रदर्शन करे उसे ही इस प्रकार का प्रोत्साहन दे। 

जबरदस्ती और फ्री में देने से शिक्षा का और बच्चे का कोई भला नहीं होने वाला।

फ्री के चक्कर में सोवियत संघ जैसा हाल होता है।

इसलिए सरकार नोन परफार्म करने वाले बच्चों से टैबलेट वापस ले और उन्हें दे जो सचमुच पढ़ना चाहते हैं।

इसी फ्री और तुष्टिकरण जैसे जबरदस्ती वितरण का परिणाम है कि मिडिया  में रोज ऐसे नान परफार्मर की वज़ह से ही हमारी खिल्ली उड़ाई जा रही है और हम सिवाय मूकदर्शक बन कर देखने के कुछ नहीं कर पा रहे हैं।

कटु शब्दों के लिए क्षमा प्रार्थी।

एक अध्यापक।