शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

                नारी या  नारिया
झंडू बोलयो
अपणी स ब्याह की तैयारी
मै बोल्यो
ब्याह खातर चाहिए एक नारी
अर इब आवै स नारिया
तू बता के ल्यावैगो
नारी अक नारिया
झंडू बोल्यो या कैतरा,मै बोल्यो
एक दिन मै पडोस क घरां गयो
अर आवाज लगाई ,कठे सा ताई
इतना मै चुन्नी न ऊपर नीचे करती कोई आई
बोली भाई साहब राम राम
मै बोल्यो बहनजी राम राम
मेरो बहन जी कहणो थो
अर उठे तमाशो वहणो थो
ताई लगी बडबडाण
बोलण को ना बेरो
के भाई लागै स यो तेरो
जेठा न भाई कहंण लागगी
तेरी मति क, के दीवल लागगी
अर ताई उन्नै एक त एक डायलोग सुनाण लागगी
डायलोग सुण क इब बहू भी मिणमिणाण लागगी
व तो भाई कोठा मा स ही तीर चलाण लागगी
अर ताई न किमी किमी बकण लागगी
फेर के थो
मै तो पाछा न हो गयो
अर उण क घरां महाभारत शुरू वह गयो
एक ती बढ़ क एक गोला बगावै  थी
वा उन्नै अर वा उन्नै शौक बतावै थी
भोत सोहणी बतला रही थी
दोनू एक दूसरी को इतिहास गा रही थी
उरा उरा की छोड़
पीहर तक निशानों लगा रही थी
उण की आवाज़ सारा मोहल्ला की शोभा बढ़ा रही थी
आवाज़ सुण क, ताऊ ताश छोड़ क आयो
मै बोल्यो ताऊ, congratulation
रोला न सुण क ताऊ घबरायो
मेरी congrt.सुण क हडबडायो
अर बोल्यो क्यां की congrt. भाई
मै बोल्यो झंडू एक ब्याह न भी रोवै स
अर तेरो दो दो म नम्बर होवै स
ताऊ आँख काढ क बोलो के गावै स
मै बोल्यो मेरा कानी के आँख काढ़ा सा
व देख,सारा मोहल्ला न सुणाण लागरी
ताई अर बोह्डिया एक दूसरी न शौक बताण लागरी
अरै उनकी बातां मै मतना जावा
तू के सोचा ये मेरी भार्या स
अर ई तो बिना नाथ का नारिया स
ईब तू बता झंडू
मेरी के गलती स
जो ल्या रह्यो स वाही नारिया बता रह्यो स
तू ल्याणो चाहवा सा नारी
अर ईब आवै स कलिहारी
झंडू बोल्यो
भाई बताण लागगो तो सारी बता
मै बोल्यो सुण
अर मुन्नै के बेरो
मै तो आतो जातो सुण लूँ सुं
नू आवाज़ आवै थी
एक जणी टाबरां नै धमकावै थी
कदे छोरा न अर कदे छोरी ठा ठा कै बगावै थी
कदे उन्नै चूहड़ो अर कदे उन्नै चुह्ड़ी बतावै थी
टाबरां न भूं भां मचा राखी थी
अर दादी की छाती जलै थी
एक आध बार नुनै नुनै झांकी कोशिस करी अक ना बोलू
टाबरिया माँ माँ करै था
भाग भाग कै दादी की गोदी मै बडै था
पर वा भी पट्ठी देशी घी खा री थी
बार बार टाबरा न गोदी मा बगारी थी
बस रहण दे के जी काढ़ागी
ई मर गा तो फेर पड़ी पड़ी टाडागी
बूढी को नू कहणो थो, बस आफत आगी
अर वा महाकाली बण क बूढी प छा गई
एक घंटा तक बिना पैसा की कमेंट्री सुणा दई
रोलो सुन क  बूढी को छोरो आ गयो
मै बोल्यो भाई तेरी के जात स
वा बोल्यो भाई घर आली क आगै म्हारी के औकात स
तू अपणै स्कूल मै जा
अर जाकै टाबरां न पढ़ा
ईब तू देख ले भाई झंडू
नारी आवै स अक कलिहारी
कदे  फेर अण गावं आला की ढाल पछतावा
अर रोज आकै या बात सुणावा
तू  ही ठीक रह्यो .

                            ए मेरी माँ               
                                                 जो तू कमजोर है तो
ए मेरी माँ ,तू मुझे बता                              रहने दे
तू कमजोर है या ताकतवर                          मुझे गर्भ में ही मरने दे
जो तू ताकतवर है, तो मुझे बचा                     तू भी कमजोर ,मै भी कमजोर
क्यों तकती है निरीह हिरनी सी                    न तू मेरे लिए लड़ पाती है
खड़ी हो और हथियार उठा                          न मेरी आवाज़ सुनी जाएगी
हथियार उठा ,अपनी आवाज़ उठा                 वर्ष वर्षांत तक कहानी यही दोहराई जाएगी
और मुझे बचा                                    एक के बाद एक                                    
काट डाल हर उस हाथ को                          कन्या तेरे द्वारा ही मारी जाएगी
जो बढ़ता है मेरी और.                              मजबूरियों और लाचारियों से भरी तू
जो तू ताकतवर है                                 भला मुझे क्या खड़ा होना सिखाएगी
तो क्यों राह तकती है कानून की                     तू मुझे मत बहका
पुलिस की,संविधान की                             री बेटी तू बाहर तो आ
तू अपनी आवाज़ बुलंद कर                         अपनी माँ को सदा संग खड़ा पायेगी
हथियार उठा                                     पर मेरा कहना है  री माँ
कानून संविधान और पुलिस अपने आप आ जाएगी.      जो तू  मेरे लिए
आज हथियार नहीं उठा पाती है
कल क्या बन्दुक चलाएगी .
लाचारियों और मजबूरियों का शाल ओढ़कर
मै नही आना चाहती
तू अपने ही बोझ से दबी है
तुझे मै और नहीं दबाना चाहती
इसलिए जो तू कमजोर है
मुझे मर जाने दे
ताकतवर है तो लड़ और मुझे बाहर आने दे
इतिहास रचाने दे
देश,दुनिया ,धर्म की खातिर
आवाज़ लगाने दे ,बंधी है जो बेड़ियाँ
उनके खुलने का अहसास कराने दे
देख ले माँ
मुझे मर जाने दे
या बाहर आने दे.

    
                                                                     हे मेरे अध्यापक 
सच में जो चिंता है मेरी
सच में जो जल रहे हो हमारी खातिर
सच में तुम्हारा प्रकाश है
आलोकित करने को मेरा पथ
तो तुम अतुल्य हो हे मेरे अध्यापक

सच में यदि
मेरे साथ होते अन्याय को देखकर
खौल उठता है तुम्हारा लहू
और मेरा दमन होता देखकर
 सजल हो उठती है तुम्हारी आखें  
 तो तुम ............................

सच में मुझे देखकर
उभर आती है धरम तुला ,तुम्हारी आखों में
मेरे विकास पर भरी नहीं पड़ता
तुम्हारे खून का भी रिश्ता भी
तो तुम ..........................................

सच में जो चाहते हो की
मै विकास करूं
सच में जो चाहते हो की मै पंख पसर उडूं
सच में जो चाहते हो की मै तुझ सा बनूं
तो तुम .....................................

सच में जो चाहते हो की
अपने और तेरे नाम का आलोक करूं
बेचारा समझ कभी दया न करना
 लगा देना अपने कठोरतम नियम भी मुझ पर
जो तुम ऐसे ही हो
तो तुम ............................

और मेरा समर्पण है,पत्थर से पारस हो जाने को .