शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

    
                                                                     हे मेरे अध्यापक 
सच में जो चिंता है मेरी
सच में जो जल रहे हो हमारी खातिर
सच में तुम्हारा प्रकाश है
आलोकित करने को मेरा पथ
तो तुम अतुल्य हो हे मेरे अध्यापक

सच में यदि
मेरे साथ होते अन्याय को देखकर
खौल उठता है तुम्हारा लहू
और मेरा दमन होता देखकर
 सजल हो उठती है तुम्हारी आखें  
 तो तुम ............................

सच में मुझे देखकर
उभर आती है धरम तुला ,तुम्हारी आखों में
मेरे विकास पर भरी नहीं पड़ता
तुम्हारे खून का भी रिश्ता भी
तो तुम ..........................................

सच में जो चाहते हो की
मै विकास करूं
सच में जो चाहते हो की मै पंख पसर उडूं
सच में जो चाहते हो की मै तुझ सा बनूं
तो तुम .....................................

सच में जो चाहते हो की
अपने और तेरे नाम का आलोक करूं
बेचारा समझ कभी दया न करना
 लगा देना अपने कठोरतम नियम भी मुझ पर
जो तुम ऐसे ही हो
तो तुम ............................

और मेरा समर्पण है,पत्थर से पारस हो जाने को .








                        

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