रविवार, 17 अप्रैल 2011

देशभक्ति


क्या शिकायत उनसे
जो कभी हमारे न थे
आंसू तो तब आते है,जब
हमारे होकर भी तुम हमारे नहीं
क्यों सपने बनाते हो की
गुलाम नहीं अब भारत
वर्ना,देशभक्ति का मै अपनी
जलवा दिखा देता
तुझ पर ऐ वतन
अपना सब कुछ लुटा देता
पर मै कहता हूँ की
कुछ भी लुटाने की जरूरत नहीं
तुम बस निर्वाह कर दो
अपने कर्तव्य का
देश स्वर्ग बन जाये
तक्षशिला फिर खिल जाये
मेघदूत शकुंतलम से ग्रन्थ
फिर रचे जाये
उर्वशी को आना ही पड़े फिर
रम्भा को गाना ही पड़े फिर
राणा की कुर्बानी काम आ जायेगी
रोती बहन भगत सिहं की चुप हो जायेगी
हुई जो हालत सुभाष की
भरपाई हो जायेगी  
ओ मेरे देश वासी,सुनकर नहीं देख ही लेना
देश सोने की चिड़िया हो जायेगी
इसलिए क्या मलाल की
गुलाम नहीं अब भारत
देशभक्ति का मै अपनी वर्ना  
जलवा दिखा देता
आओ अपने कर्म का जलवा दिखाए
देश को सोने की चिड़िया बनाये .   

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

देखा है हमने

क्या बताएँ उनकी
जो नज़ारे देखे है हमने
दिन में खामोसी और
रात में तांडव देखा है हमने
पीठ के आगे छुरी चलाते
लोगों को देखा है हमने
रक्षको को भक्षक और
विद्वानों को मूर्ख बनते देखा है हमने
डंडे के दम पर
दुनिया चलाने वाले
नीम हकीमो को खुदा समझने वाले
आदर्शो का भाषण झाड़नेवाले
चोरों को देखा है हमने
क्या बताये ...............................
शिक्षा को महफ़िल समझने वाले
पंसेरियो से किडी फोड़ने वाले
उल्टीगंगा पहाड़ चढाने वाले
लोगों को देखा है हमने
अरे बाड़ खेत खाती
देखी है हमने
शराबी नाचता दुनिया देखे
बोतल को नाचते
देखा है हमने
कौवा मौज उडाता और
हँसो को भूखे मरते
देखा है हमने
सूरज(ज्ञानी ) को शरमाते और
चंदा को आग बरसातेदेखा है हमने
क्या बताये ..........................
गधे के सिर पर
 सींग देखे है हमने
मोर नाचता दुनिया देखे
छड नाचती देखी है हमने
आँखों वाले अंधे
देखे है हमने
चोर घूमते
साहूकारों को सड़ते
देखा है हमने
क्या बताएं उनकी
जो नज़ारे देखे है हमने
    

गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

एक बेचारा


पुरुष एक ऐसा बेचारा
जो दबा रहता है पहले तो
बस्ते के बोझ से
फिर दब जाता है करियर के बोझ से
बन जाये तो दब जाता है
नौकरी के बोझ से
वर्ना धसक जाता है
बेरोजगारी के बोझ से
और बाद में .....................
बद में तो दब जाता है पत्नी के बोझ से
रही कसर पूरी हो जाती है बच्चों के बोझ से
ओवरलोड हो जाता है
बुआ और बहनों के बोझ से
कचूमर ही निकल जाता है
भांजे और भांजियो के बोझ से
हर किसी की मांगो के बोझ से
पत्नी की तड़ी के बोझ से
सास बहू के महाभारत के बोझ से
फटने को हो जाता है
समाज की खिचातान से
बेटा बेटी की शान से,उनके ऐसो आराम से
पढाई लिखाई के खर्चो के भान से
रही कसर  पूरी हो जाती है
पत्नी के गुमान से
बचे चिथडो को उधेड़ देता है
बेटी का ब्याह
हो जाते है इसके साथ ही
 उसके अरमान स्वाह
बेटे की बहू फिर डोरी खीच जाती है
धर रूप सिहंनी का
रसोई नई जमाती है
फिर से पत्नी छाती पर चढ़ जाती है
बहू द्वारा अपनी उपेक्षा का राग सुनती है
बेचारे पुरुष की जिंदगी
सफ़ेद से स्याह हो जाती है
उसके जीवन की यही कहानी है
जन्म जन्म तक उसे निभानी है


बुधवार, 6 अप्रैल 2011

घूँघट

किलकारियो के दिनों में
समझ से परे था घूँघट
बालपन में कौतुहल रहा
मेरे लिए घूँघट
युवा अवस्था को
बेकार और दकियानुसी लगा घूँघट

अंधविश्वासों और
कुप्रथाओ का वाहक लगा
मुझे घूँघट
 मुझे लगा अनपढ़ता का
परिचायक है घूँघट
और मुझे लगा स्त्री का दमन है घूँघट

थोड़ा आगे बढ़ने पर
मेरे अंह से से जुड़ा घूँघट
अब न करने पर
स्त्रियों द्वारा घूँघट
मुझे लगता अहं आहात है
मुझे लगा पुरुष का अहं है घूँघट

पर बढते अनुभव ने
मुझे सिखया न कौतुहल
न दकियानुसी,न अनपढ़ताका
न कुप्रथाओ का और
न ही दमन का
परिचायक है घूँघट

ये तो सामंजस्य है
सम्मान का,अपनेपन का
संस्कृति का,गरिमाओं का
फिर अब जाना
प्रथाओ की सूक्ष्मता को पहचाना
की,स्त्री,पुरुष के गौरव का वाहक है घूँघट

सिर्फ स्त्रियाँ ही नहीं
पुरुष भी करते है घूँघट
उसी गौरव को बचाए रखने खातिर
यदि स्त्री नहीं कर पाती
तो,मै कर लेता हूँ
अब घूँघट

डोली

अक्सर पूछता होगा
तेरा मन ये प्रश्न
डोली,स्त्री की क्यों,
पुरुष की क्यों नहीं
तो सुन
हमें जो मिला
तीर कमानों के बीच,मिला जो दर्शन
कुरुक्षेत्र के रण बीच (गीता दर्शन )
हमें जो मिला करता है
वनों,कंदराओ,गुफाओ में जाकर
योग्य अयोग्य के ताने सुनकर
 भिन्न भिन्न गुरुजनों की ठोकर खाकर
वर्षों बैठकर या खड़े रहकर (तपस्या )
कभी कभी तो जनम दर जन्म भटककर
वही दर्शन जो हमने सीखा ठोकरे खाकर
तुझे दिया डोली का उपहार सजाकर
हमने सीखा,सब छूट जाना है
गुफाओ में जाकर,कष्ट उठाकर
पर तुझे सिखाया
सिर्फ डोली उठाकर
ताकि प्रयोगात्मक रूप में सीख सको
क्या सच में,कोई किसी का है ????????
मिले थे जो तक,अब छूट रहे है
मिलने वाले साथ रहेंगे कब तक ?
इसी तरह सब छूट जाना है
प्राण अकेला रह जायेगा
मोह का बंधन यू ही भटकायेगा
इसलिए,इतना भर सीख जा
यही मिला है यही छूट जायेगा
वर्ना तेरे सिखने तक
जमाना यूँ ही
तेरी डोली उठाएगा !


पूर्व में हो सकता है इसी विचार से प्रभावित होकर हमारे यहाँ ये प्रथा चली हो.हम सब जानते है की जब हमारे प्रिय लोग हमसे छूटते है तो मन एकदम वैराग्य से भर जाता है और कुछ भी अच्छा नहीं लगता .जो लोग छात्रावासो,में या फ़ौज में या घर से दूर रहे है वे शायद मेरे विचार को ज्यादा गहराई से महसूस कर सके .फिर भी ये मेरा निजी विचार है .हो सकता कुछ लोग या सब लोग इससे सहमत न हो .असहमति के लिए क्षमा.

रविवार, 3 अप्रैल 2011

आदमी का जीवन



अमूमन देखा है हमने की
आदमी का जीवन,एक मैदान
लड़ा करती जहां,उसकी मनावस्थाएं
बंदूके तान,
आदमी की जिंदगी,एक पहिया
जिसमे चुभे है,रिश्ते नाती
कांटे बनकर
जो दर्द करते है,चुभे रहने पर भी
फाड देने पर भी.
आदमी की आमदनी
कम पड़ जाती है सदा
वह राजा हो या रंक
उसकी अभिलाषाएँ
अतृपत ही रह जाती है सदा
भोगों को कितना ही ठूंस डालो उसमे चाहे
आदमी का जीवन
ऐसा दलदल
धंसता ही जाता है वह
जितना बाहर आने को छटपटाता वह
पर इसके अलावा भी है
आदमी का जीवन
एक अनमोल उपहार इश्वर का
ले जा सकता है उसे
भारत की मूल खोज ध्यान,धारणा की ओर
जिसके सामने
ये दर्द,ये पीड़ाएँ
कुछ नहीं,कुछ नहीं 

शनिवार, 2 अप्रैल 2011

पत्नी चाहिए

हे इश्वर


वरदानो से भरी तेरी इस दुनिया में,मुझे सब कुछ मिला नहीं मिली तो बस पत्नी .हो सकता है मेरा पत्र पढकर आप हँसने लगो ,मुझे पागल बताने लगो ,हो सकता मेरा मजाक उड़ानें लगो की कैसा बेवकूफ है इसे इतनी भीड़ में पत्नी नहीं नज़र आ रही, और भी जाने क्या क्या सोचने लगो.हे इश्वर आप हो सकता है मुझ पर क्रोधित हो,या झ्ल्लाओ ,पर कोई बात नहीं जब मै तुम्हारे प्यार और आशीर्वाद को पता हूँ तो नाराजगी भी झेलने का प्रयत्न करूँगा.ये पर सच है की मुझे पत्नी नहीं मिल रही भगवन मुझे अपने लिए एक लड़की चाहिए जिसे अपने स्त्री होने पर गर्व हो,स्वाभिमान हो जो अपने स्त्री होने या कमजोर होने का रोना रोने वाली न हो.मुझे पत्नी चाहिए जो वास्तव में बुद्धिमान हो,क्योंकि घर चलाने के लिए नित्य नया सोचना पड़ता है.बनी बनाई शैली से सिर्फ कार्यालय चलते है,चाहे वह उपायुक्तकार्यालय हो या अन्य कोई कार्यालय.निश्चितढर्रे से कार्यालय चलते है घर नहीं.यहाँ तो रोज सूरज उगने के साथ नया सोचना पड़ता है,बच्चों के लिए अलग,पति के लिए अलग,अपने लिए अलग, अन्य संबंधियो के लिए अलग, हर छण अलग और इतना केवल एक बुद्धिमान स्त्री ही सोच सकती है, अंक तालिकाओ में ज्यादा ज्यादा अंक प्राप्त करने वाली नहीं, मुझे पत्नी चाहिए जो समझ सके की, मै और वो एक दूसरे के पूरक है और मिलकर जीवन को सरल बना रहे है,जो समझ सके की हम न समान, न असमान हम तो बस पूरक है एक दूसरे के, और पूरकता में समर्पण होता है ,कोई समान असमान नहीं ,जो समझ सके की छोटा या बड़ा नहीं बस पूरक है हम.वह रोज रोज समानाधिकार का रोब न दिखाए.भगवन तेरी एक ही कृति थी जो तेरे बाद घर जैसी जटिल व्यवस्था को चला सकती थी,वह भी अब मेरीतरह रूपये कमाने की मशीन बनना चाहती है,अब आप हीबताये घर में जब दोनों ही मशीन होंगी तो घर कैसे चलेगा .मुझसे मशीनों के विवाह प्रस्ताव आते है सब मशीन बनकर आना छाती है,पत्नी बनकर नहीं .और मुझे मशीन नहीं चाहिए भगवन,मुझे तेरी वह कृति चाहिए ,सोंदर्य जिसके अंतर में बसा हो,वह नहीं जो शरीर के सोंदर्य को सुंदरता समझकर उसे दिखाती फिरती है,तुम तो जानते हो की की अंतर का सोंदर्य बिना किसी प्रयत्न के ही दृष्टिगोचर है इसलिए कहता हूँ भगवन की मुझे एक पत्नी चाहिए जो अपनी बुद्धिमानी से घर को सुंदर बनाये न की झाड़फनूसो से.अब आप ही बताओ भगवन की मेरी तलाश कब खत्म होगी