पुरुष एक ऐसा बेचारा
जो दबा रहता है पहले तो
बस्ते के बोझ से
फिर दब जाता है करियर के बोझ से
बन जाये तो दब जाता है
नौकरी के बोझ से
वर्ना धसक जाता है
बेरोजगारी के बोझ से
और बाद में .....................
बद में तो दब जाता है पत्नी के बोझ से
रही कसर पूरी हो जाती है बच्चों के बोझ से
ओवरलोड हो जाता है
बुआ और बहनों के बोझ से
कचूमर ही निकल जाता है
भांजे और भांजियो के बोझ से
हर किसी की मांगो के बोझ से
पत्नी की तड़ी के बोझ से
सास बहू के महाभारत के बोझ से
फटने को हो जाता है
समाज की खिचातान से
बेटा बेटी की शान से,उनके ऐसो आराम से
पढाई लिखाई के खर्चो के भान से
रही कसर पूरी हो जाती है
पत्नी के गुमान से
बचे चिथडो को उधेड़ देता है
बेटी का ब्याह
हो जाते है इसके साथ ही
उसके अरमान स्वाह
बेटे की बहू फिर डोरी खीच जाती है
धर रूप सिहंनी का
रसोई नई जमाती है
फिर से पत्नी छाती पर चढ़ जाती है
बहू द्वारा अपनी उपेक्षा का राग सुनती है
बेचारे पुरुष की जिंदगी
सफ़ेद से स्याह हो जाती है
उसके जीवन की यही कहानी है
जन्म जन्म तक उसे निभानी है
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