हे इश्वर
वरदानो से भरी तेरी इस दुनिया में,मुझे सब कुछ मिला नहीं मिली तो बस पत्नी .हो सकता है मेरा पत्र पढकर आप हँसने लगो ,मुझे पागल बताने लगो ,हो सकता मेरा मजाक उड़ानें लगो की कैसा बेवकूफ है इसे इतनी भीड़ में पत्नी नहीं नज़र आ रही, और भी जाने क्या क्या सोचने लगो.हे इश्वर आप हो सकता है मुझ पर क्रोधित हो,या झ्ल्लाओ ,पर कोई बात नहीं जब मै तुम्हारे प्यार और आशीर्वाद को पता हूँ तो नाराजगी भी झेलने का प्रयत्न करूँगा.ये पर सच है की मुझे पत्नी नहीं मिल रही भगवन मुझे अपने लिए एक लड़की चाहिए जिसे अपने स्त्री होने पर गर्व हो,स्वाभिमान हो जो अपने स्त्री होने या कमजोर होने का रोना रोने वाली न हो.मुझे पत्नी चाहिए जो वास्तव में बुद्धिमान हो,क्योंकि घर चलाने के लिए नित्य नया सोचना पड़ता है.बनी बनाई शैली से सिर्फ कार्यालय चलते है,चाहे वह उपायुक्तकार्यालय हो या अन्य कोई कार्यालय.निश्चितढर्रे से कार्यालय चलते है घर नहीं.यहाँ तो रोज सूरज उगने के साथ नया सोचना पड़ता है,बच्चों के लिए अलग,पति के लिए अलग,अपने लिए अलग, अन्य संबंधियो के लिए अलग, हर छण अलग और इतना केवल एक बुद्धिमान स्त्री ही सोच सकती है, अंक तालिकाओ में ज्यादा ज्यादा अंक प्राप्त करने वाली नहीं, मुझे पत्नी चाहिए जो समझ सके की, मै और वो एक दूसरे के पूरक है और मिलकर जीवन को सरल बना रहे है,जो समझ सके की हम न समान, न असमान हम तो बस पूरक है एक दूसरे के, और पूरकता में समर्पण होता है ,कोई समान असमान नहीं ,जो समझ सके की छोटा या बड़ा नहीं बस पूरक है हम.वह रोज रोज समानाधिकार का रोब न दिखाए.भगवन तेरी एक ही कृति थी जो तेरे बाद घर जैसी जटिल व्यवस्था को चला सकती थी,वह भी अब मेरीतरह रूपये कमाने की मशीन बनना चाहती है,अब आप हीबताये घर में जब दोनों ही मशीन होंगी तो घर कैसे चलेगा .मुझसे मशीनों के विवाह प्रस्ताव आते है सब मशीन बनकर आना छाती है,पत्नी बनकर नहीं .और मुझे मशीन नहीं चाहिए भगवन,मुझे तेरी वह कृति चाहिए ,सोंदर्य जिसके अंतर में बसा हो,वह नहीं जो शरीर के सोंदर्य को सुंदरता समझकर उसे दिखाती फिरती है,तुम तो जानते हो की की अंतर का सोंदर्य बिना किसी प्रयत्न के ही दृष्टिगोचर है इसलिए कहता हूँ भगवन की मुझे एक पत्नी चाहिए जो अपनी बुद्धिमानी से घर को सुंदर बनाये न की झाड़फनूसो से.अब आप ही बताओ भगवन की मेरी तलाश कब खत्म होगी
वरदानो से भरी तेरी इस दुनिया में,मुझे सब कुछ मिला नहीं मिली तो बस पत्नी .हो सकता है मेरा पत्र पढकर आप हँसने लगो ,मुझे पागल बताने लगो ,हो सकता मेरा मजाक उड़ानें लगो की कैसा बेवकूफ है इसे इतनी भीड़ में पत्नी नहीं नज़र आ रही, और भी जाने क्या क्या सोचने लगो.हे इश्वर आप हो सकता है मुझ पर क्रोधित हो,या झ्ल्लाओ ,पर कोई बात नहीं जब मै तुम्हारे प्यार और आशीर्वाद को पता हूँ तो नाराजगी भी झेलने का प्रयत्न करूँगा.ये पर सच है की मुझे पत्नी नहीं मिल रही भगवन मुझे अपने लिए एक लड़की चाहिए जिसे अपने स्त्री होने पर गर्व हो,स्वाभिमान हो जो अपने स्त्री होने या कमजोर होने का रोना रोने वाली न हो.मुझे पत्नी चाहिए जो वास्तव में बुद्धिमान हो,क्योंकि घर चलाने के लिए नित्य नया सोचना पड़ता है.बनी बनाई शैली से सिर्फ कार्यालय चलते है,चाहे वह उपायुक्तकार्यालय हो या अन्य कोई कार्यालय.निश्चितढर्रे से कार्यालय चलते है घर नहीं.यहाँ तो रोज सूरज उगने के साथ नया सोचना पड़ता है,बच्चों के लिए अलग,पति के लिए अलग,अपने लिए अलग, अन्य संबंधियो के लिए अलग, हर छण अलग और इतना केवल एक बुद्धिमान स्त्री ही सोच सकती है, अंक तालिकाओ में ज्यादा ज्यादा अंक प्राप्त करने वाली नहीं, मुझे पत्नी चाहिए जो समझ सके की, मै और वो एक दूसरे के पूरक है और मिलकर जीवन को सरल बना रहे है,जो समझ सके की हम न समान, न असमान हम तो बस पूरक है एक दूसरे के, और पूरकता में समर्पण होता है ,कोई समान असमान नहीं ,जो समझ सके की छोटा या बड़ा नहीं बस पूरक है हम.वह रोज रोज समानाधिकार का रोब न दिखाए.भगवन तेरी एक ही कृति थी जो तेरे बाद घर जैसी जटिल व्यवस्था को चला सकती थी,वह भी अब मेरीतरह रूपये कमाने की मशीन बनना चाहती है,अब आप हीबताये घर में जब दोनों ही मशीन होंगी तो घर कैसे चलेगा .मुझसे मशीनों के विवाह प्रस्ताव आते है सब मशीन बनकर आना छाती है,पत्नी बनकर नहीं .और मुझे मशीन नहीं चाहिए भगवन,मुझे तेरी वह कृति चाहिए ,सोंदर्य जिसके अंतर में बसा हो,वह नहीं जो शरीर के सोंदर्य को सुंदरता समझकर उसे दिखाती फिरती है,तुम तो जानते हो की की अंतर का सोंदर्य बिना किसी प्रयत्न के ही दृष्टिगोचर है इसलिए कहता हूँ भगवन की मुझे एक पत्नी चाहिए जो अपनी बुद्धिमानी से घर को सुंदर बनाये न की झाड़फनूसो से.अब आप ही बताओ भगवन की मेरी तलाश कब खत्म होगी
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