बुधवार, 6 अप्रैल 2011

घूँघट

किलकारियो के दिनों में
समझ से परे था घूँघट
बालपन में कौतुहल रहा
मेरे लिए घूँघट
युवा अवस्था को
बेकार और दकियानुसी लगा घूँघट

अंधविश्वासों और
कुप्रथाओ का वाहक लगा
मुझे घूँघट
 मुझे लगा अनपढ़ता का
परिचायक है घूँघट
और मुझे लगा स्त्री का दमन है घूँघट

थोड़ा आगे बढ़ने पर
मेरे अंह से से जुड़ा घूँघट
अब न करने पर
स्त्रियों द्वारा घूँघट
मुझे लगता अहं आहात है
मुझे लगा पुरुष का अहं है घूँघट

पर बढते अनुभव ने
मुझे सिखया न कौतुहल
न दकियानुसी,न अनपढ़ताका
न कुप्रथाओ का और
न ही दमन का
परिचायक है घूँघट

ये तो सामंजस्य है
सम्मान का,अपनेपन का
संस्कृति का,गरिमाओं का
फिर अब जाना
प्रथाओ की सूक्ष्मता को पहचाना
की,स्त्री,पुरुष के गौरव का वाहक है घूँघट

सिर्फ स्त्रियाँ ही नहीं
पुरुष भी करते है घूँघट
उसी गौरव को बचाए रखने खातिर
यदि स्त्री नहीं कर पाती
तो,मै कर लेता हूँ
अब घूँघट

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