रविवार, 3 अप्रैल 2011

आदमी का जीवन



अमूमन देखा है हमने की
आदमी का जीवन,एक मैदान
लड़ा करती जहां,उसकी मनावस्थाएं
बंदूके तान,
आदमी की जिंदगी,एक पहिया
जिसमे चुभे है,रिश्ते नाती
कांटे बनकर
जो दर्द करते है,चुभे रहने पर भी
फाड देने पर भी.
आदमी की आमदनी
कम पड़ जाती है सदा
वह राजा हो या रंक
उसकी अभिलाषाएँ
अतृपत ही रह जाती है सदा
भोगों को कितना ही ठूंस डालो उसमे चाहे
आदमी का जीवन
ऐसा दलदल
धंसता ही जाता है वह
जितना बाहर आने को छटपटाता वह
पर इसके अलावा भी है
आदमी का जीवन
एक अनमोल उपहार इश्वर का
ले जा सकता है उसे
भारत की मूल खोज ध्यान,धारणा की ओर
जिसके सामने
ये दर्द,ये पीड़ाएँ
कुछ नहीं,कुछ नहीं 

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