बुधवार, 6 अप्रैल 2011

डोली

अक्सर पूछता होगा
तेरा मन ये प्रश्न
डोली,स्त्री की क्यों,
पुरुष की क्यों नहीं
तो सुन
हमें जो मिला
तीर कमानों के बीच,मिला जो दर्शन
कुरुक्षेत्र के रण बीच (गीता दर्शन )
हमें जो मिला करता है
वनों,कंदराओ,गुफाओ में जाकर
योग्य अयोग्य के ताने सुनकर
 भिन्न भिन्न गुरुजनों की ठोकर खाकर
वर्षों बैठकर या खड़े रहकर (तपस्या )
कभी कभी तो जनम दर जन्म भटककर
वही दर्शन जो हमने सीखा ठोकरे खाकर
तुझे दिया डोली का उपहार सजाकर
हमने सीखा,सब छूट जाना है
गुफाओ में जाकर,कष्ट उठाकर
पर तुझे सिखाया
सिर्फ डोली उठाकर
ताकि प्रयोगात्मक रूप में सीख सको
क्या सच में,कोई किसी का है ????????
मिले थे जो तक,अब छूट रहे है
मिलने वाले साथ रहेंगे कब तक ?
इसी तरह सब छूट जाना है
प्राण अकेला रह जायेगा
मोह का बंधन यू ही भटकायेगा
इसलिए,इतना भर सीख जा
यही मिला है यही छूट जायेगा
वर्ना तेरे सिखने तक
जमाना यूँ ही
तेरी डोली उठाएगा !


पूर्व में हो सकता है इसी विचार से प्रभावित होकर हमारे यहाँ ये प्रथा चली हो.हम सब जानते है की जब हमारे प्रिय लोग हमसे छूटते है तो मन एकदम वैराग्य से भर जाता है और कुछ भी अच्छा नहीं लगता .जो लोग छात्रावासो,में या फ़ौज में या घर से दूर रहे है वे शायद मेरे विचार को ज्यादा गहराई से महसूस कर सके .फिर भी ये मेरा निजी विचार है .हो सकता कुछ लोग या सब लोग इससे सहमत न हो .असहमति के लिए क्षमा.

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