गुरुवार, 29 जून 2017

तेरे श्रंगार

              तेरे श्रंगार
तेरा यौवन,
उठा देता है दुनिया भर की निगाहे
लाता है तेरे लिए दुनिया भर की मुसीबत
दो चुडियां पर
मिटा देती है आधी आफत को
नज़र आने पर इनके
आधी दुनिया की सोच बदल जाती है
चाह बदल जाती है
तिस पर चमकता सिन्दूर मिटा डालता है
बची आधी आफत को
जगा देता दुनिया के मनो में तेरे लिए श्रध्दा
बना देता तुझे आदरणीय
बन कर खड़ा हो जाता है तेरी ढाल
फिर ऊँगली पकड़े बच्चा
लाता है तेरे लिए सौगात
मिटा डालता है बची आफतों का भंडार
बना देता है तुझे वसुंधरा सम
बनाता है तुझे, सजग, चेतन और पूजनीय
जो तैयार थे कभी तूझे लूटने को
अब तुझ पर आदर लूटाते है
अब भी पर कुछ सिरफिरे
 आहें उड़ाते है
उनका कोई इलाज नहीं
उनके लिए तेरी ढाले बेमानी है
उनके लिए तुझे अपनी चप्पल उठानी है
यही तेरा अंतिम ब्रह्मास्त्र
जो दिया था हमने तुझे
तेरी सगाई पर,विवाह में
हर वर्ष और अनेकों बार
विश्वास रख अचूक जायेगा
इसका वार
ये चला नहीं कि
तुझे सबका साथ मिला नहीं
इसलिए अपने श्रंगारो को सम्हाल
मत समझ इन्हें जंजाल
इन्ही से तू मालामाल
वर्षों के हमारे शोध और तपस्या का परिणाम
तेरे हथियार

ये तेरे श्रंगार. 

गुरुवार, 19 मार्च 2015

Quality education
Thursday, March 19, 2015
8:32 PM
भिन्न भिन्न सेमिनारो से पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से व् कार्यशालाओ के माध्यम से यह बताया जा रहा है की नीतियाँ बनाने व् शिक्षण सामग्री पर बहुत अधिक  खर्च हो रहा है | निसंदेह नियत अच्छी है पर उतना सुधार परिलक्षित नहीं हो रहा जितना अपेक्षित है ,infrastructure के स्तर पर अब विकास दिखने लगा है | शिक्षा में गुणवत्ता का वांछित सुधार व् स्तर अभी दिखाई नहीं दे रहा है अगर सरकार व् अध्यापक कार्य नहीं करते तो जो ढाचां गत विकास दिखा है वह नहीं दिखता |इसका अर्थ है की अध्यापक व् इससे जुडी इकाइयों ने अपना कार्य किया है ,फिर क्या हुआ की पढने पढ़ाने में व् सिक्षा की गुणवत्ता में उतना सुधार क्यों नहीं हुआ जो होना चाहिए |
मै समझता हूँ इसके कुछ कारण इस प्रकार हो सकते है
१ शिक्षण के सिधान्तो को बनाना एक बात है और परन्तु उन्हें लागु करना दूसरी बात है और मुझे लगता है इसी स्तर पर हमसे बार बार चूक हो रही है
समाधान : अगर नीतियाँ बनाने से पहले हमारे एक्सपर्ट खंड स्तर पर पांच स्कूलों में कम से कम दो दो महीने पढ़ाकर देखें व् वहां कार्यरत अध्यापको को कक्षाएं पढाकर दिखाएँ की इस प्रकार विविधताओं से भरी कक्षा में शिक्षण कार्य करना है |
इसके दो फायदे होंगे
१ प्रथम तो माडल शिक्षण को अपने सामने क्रियान्वित होते देखकर बाकी  सभी अध्यापको की शैली में रचनात्मक सुधार होगा व् शिक्षक वर्ग दो महीने एक्सपर्ट के सम्पर्क रहकर अपने ज्ञान स्तर को बनाये रख सकेगा व् शिक्षण व् शिक्षण की नवीनतम विधियों को सीख भी सकेगा व् अपनी आखों के सामने उनका क्रियान्वन भी देख सकेगा |
२ दुसरे एक्सपर्ट भी ग्राउंड लेवल की समस्याओं को व् विविधताओं से भरी कक्षा को साकार रूप में देख व् जान सकेंगे व् भविष्य की नीतियों व् पाठ्यक्रम को बनाते समय वे स्थिति से पूर्णतया परिचित भी होंगे क्योकि काल्पनिक स्तिथियों को मानकर पालिसी बनाना एक बात है और ग्राउंड पर उनका उपयोग करना दूसरी बात है और मै समझता हूँ उपरोक्त प्रकार से कार्य कर हम हम दोनों ही स्थितियों से निजात पा सकते है
और हमारे सामने समस्या यही है की कोई भी उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति निचले पायदान पर कार्य करने की सोचता ही नहीं हर शोधार्थी या पीएचडी धारी विश्वविद्यालय स्तर पर काम करने पर जहाँ गर्व अनुभव करता है वहीं शिक्षा की जड़ों में जाकर उसे सिचनें में अपनी तौहीन समझता है | हमारी व्यवस्था ने ऐसा माहौल बना दिया है कि अधिकतर उच्च शिक्षित लोगों को आदेशात्मक पद चाहिए.
इतना परिश्रम व् धन का व्यय करने के बाद भी जो स्तर पाने को हम आज भी लालायित है, हो सकता है एक्सपर्ट को जमीन पर भेजकर सहज ही प्राप्त हो जाये | नहीं तो मुझे लगता है की कहीं क्वालिटी एजुकेशन हमारे लिए दिवा स्वप्न ही बनकर न रह जाये |      


शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

                नारी या  नारिया
झंडू बोलयो
अपणी स ब्याह की तैयारी
मै बोल्यो
ब्याह खातर चाहिए एक नारी
अर इब आवै स नारिया
तू बता के ल्यावैगो
नारी अक नारिया
झंडू बोल्यो या कैतरा,मै बोल्यो
एक दिन मै पडोस क घरां गयो
अर आवाज लगाई ,कठे सा ताई
इतना मै चुन्नी न ऊपर नीचे करती कोई आई
बोली भाई साहब राम राम
मै बोल्यो बहनजी राम राम
मेरो बहन जी कहणो थो
अर उठे तमाशो वहणो थो
ताई लगी बडबडाण
बोलण को ना बेरो
के भाई लागै स यो तेरो
जेठा न भाई कहंण लागगी
तेरी मति क, के दीवल लागगी
अर ताई उन्नै एक त एक डायलोग सुनाण लागगी
डायलोग सुण क इब बहू भी मिणमिणाण लागगी
व तो भाई कोठा मा स ही तीर चलाण लागगी
अर ताई न किमी किमी बकण लागगी
फेर के थो
मै तो पाछा न हो गयो
अर उण क घरां महाभारत शुरू वह गयो
एक ती बढ़ क एक गोला बगावै  थी
वा उन्नै अर वा उन्नै शौक बतावै थी
भोत सोहणी बतला रही थी
दोनू एक दूसरी को इतिहास गा रही थी
उरा उरा की छोड़
पीहर तक निशानों लगा रही थी
उण की आवाज़ सारा मोहल्ला की शोभा बढ़ा रही थी
आवाज़ सुण क, ताऊ ताश छोड़ क आयो
मै बोल्यो ताऊ, congratulation
रोला न सुण क ताऊ घबरायो
मेरी congrt.सुण क हडबडायो
अर बोल्यो क्यां की congrt. भाई
मै बोल्यो झंडू एक ब्याह न भी रोवै स
अर तेरो दो दो म नम्बर होवै स
ताऊ आँख काढ क बोलो के गावै स
मै बोल्यो मेरा कानी के आँख काढ़ा सा
व देख,सारा मोहल्ला न सुणाण लागरी
ताई अर बोह्डिया एक दूसरी न शौक बताण लागरी
अरै उनकी बातां मै मतना जावा
तू के सोचा ये मेरी भार्या स
अर ई तो बिना नाथ का नारिया स
ईब तू बता झंडू
मेरी के गलती स
जो ल्या रह्यो स वाही नारिया बता रह्यो स
तू ल्याणो चाहवा सा नारी
अर ईब आवै स कलिहारी
झंडू बोल्यो
भाई बताण लागगो तो सारी बता
मै बोल्यो सुण
अर मुन्नै के बेरो
मै तो आतो जातो सुण लूँ सुं
नू आवाज़ आवै थी
एक जणी टाबरां नै धमकावै थी
कदे छोरा न अर कदे छोरी ठा ठा कै बगावै थी
कदे उन्नै चूहड़ो अर कदे उन्नै चुह्ड़ी बतावै थी
टाबरां न भूं भां मचा राखी थी
अर दादी की छाती जलै थी
एक आध बार नुनै नुनै झांकी कोशिस करी अक ना बोलू
टाबरिया माँ माँ करै था
भाग भाग कै दादी की गोदी मै बडै था
पर वा भी पट्ठी देशी घी खा री थी
बार बार टाबरा न गोदी मा बगारी थी
बस रहण दे के जी काढ़ागी
ई मर गा तो फेर पड़ी पड़ी टाडागी
बूढी को नू कहणो थो, बस आफत आगी
अर वा महाकाली बण क बूढी प छा गई
एक घंटा तक बिना पैसा की कमेंट्री सुणा दई
रोलो सुन क  बूढी को छोरो आ गयो
मै बोल्यो भाई तेरी के जात स
वा बोल्यो भाई घर आली क आगै म्हारी के औकात स
तू अपणै स्कूल मै जा
अर जाकै टाबरां न पढ़ा
ईब तू देख ले भाई झंडू
नारी आवै स अक कलिहारी
कदे  फेर अण गावं आला की ढाल पछतावा
अर रोज आकै या बात सुणावा
तू  ही ठीक रह्यो .

                            ए मेरी माँ               
                                                 जो तू कमजोर है तो
ए मेरी माँ ,तू मुझे बता                              रहने दे
तू कमजोर है या ताकतवर                          मुझे गर्भ में ही मरने दे
जो तू ताकतवर है, तो मुझे बचा                     तू भी कमजोर ,मै भी कमजोर
क्यों तकती है निरीह हिरनी सी                    न तू मेरे लिए लड़ पाती है
खड़ी हो और हथियार उठा                          न मेरी आवाज़ सुनी जाएगी
हथियार उठा ,अपनी आवाज़ उठा                 वर्ष वर्षांत तक कहानी यही दोहराई जाएगी
और मुझे बचा                                    एक के बाद एक                                    
काट डाल हर उस हाथ को                          कन्या तेरे द्वारा ही मारी जाएगी
जो बढ़ता है मेरी और.                              मजबूरियों और लाचारियों से भरी तू
जो तू ताकतवर है                                 भला मुझे क्या खड़ा होना सिखाएगी
तो क्यों राह तकती है कानून की                     तू मुझे मत बहका
पुलिस की,संविधान की                             री बेटी तू बाहर तो आ
तू अपनी आवाज़ बुलंद कर                         अपनी माँ को सदा संग खड़ा पायेगी
हथियार उठा                                     पर मेरा कहना है  री माँ
कानून संविधान और पुलिस अपने आप आ जाएगी.      जो तू  मेरे लिए
आज हथियार नहीं उठा पाती है
कल क्या बन्दुक चलाएगी .
लाचारियों और मजबूरियों का शाल ओढ़कर
मै नही आना चाहती
तू अपने ही बोझ से दबी है
तुझे मै और नहीं दबाना चाहती
इसलिए जो तू कमजोर है
मुझे मर जाने दे
ताकतवर है तो लड़ और मुझे बाहर आने दे
इतिहास रचाने दे
देश,दुनिया ,धर्म की खातिर
आवाज़ लगाने दे ,बंधी है जो बेड़ियाँ
उनके खुलने का अहसास कराने दे
देख ले माँ
मुझे मर जाने दे
या बाहर आने दे.

    
                                                                     हे मेरे अध्यापक 
सच में जो चिंता है मेरी
सच में जो जल रहे हो हमारी खातिर
सच में तुम्हारा प्रकाश है
आलोकित करने को मेरा पथ
तो तुम अतुल्य हो हे मेरे अध्यापक

सच में यदि
मेरे साथ होते अन्याय को देखकर
खौल उठता है तुम्हारा लहू
और मेरा दमन होता देखकर
 सजल हो उठती है तुम्हारी आखें  
 तो तुम ............................

सच में मुझे देखकर
उभर आती है धरम तुला ,तुम्हारी आखों में
मेरे विकास पर भरी नहीं पड़ता
तुम्हारे खून का भी रिश्ता भी
तो तुम ..........................................

सच में जो चाहते हो की
मै विकास करूं
सच में जो चाहते हो की मै पंख पसर उडूं
सच में जो चाहते हो की मै तुझ सा बनूं
तो तुम .....................................

सच में जो चाहते हो की
अपने और तेरे नाम का आलोक करूं
बेचारा समझ कभी दया न करना
 लगा देना अपने कठोरतम नियम भी मुझ पर
जो तुम ऐसे ही हो
तो तुम ............................

और मेरा समर्पण है,पत्थर से पारस हो जाने को .








                        

बुधवार, 30 जनवरी 2013

क्यों हो रहा है 

बच्चे बिगड रहे है 
शिकायते आया करती है

अखबार और पत्रिकाए
अक्सर बताया करती है
मनोवैज्ञानिक 
कारण और निवारण दे रहे है
पोथे रचे जा रहे है
पर हल नहीं ढूंढॅ पा रहे है
मै कहता हूँ                          
इसका कोई हल नहीं    
क्योकि अब जीवन सरल नहीं
अब तुम मोम डैड हुए
माता पिता के दर्शन
उनको दुर्लभ हुए
जैसे जैसे भारत में मोम डैड बढते जायेंगे
बच्चे बिगड़ते जायेंगे
विदेशों की तरह एक दिन
अपने यहाँ यही हाल  होगा        
रुपयों से जेब भरी होगी                         
पर  मानव ममता से कंगाल होगा  
बूढी आँखे ताकेंगी
पर बच्चों का अपना जहाँ  होगा
चाहते हो क्या
वो ही बन जाओ
बच्चे चहिये तो
मोम डैड छोड़कर
माता पिता बन जाओ
वर्ना आगे बढ़ो
मत पछताओ मत पछताओ 






खिडकियाँ



बालपन मे कुछ समझ न पाते

लड़के और लडकियॉ

सुनी सुनाई बातों से

अपना मानस बनाते

लड़के और लडकियॉ

नवयौवन मे कदम रखकर

पागल हो जाते है

लड़के और लडकियॉ

विवाह के लिए

फिर बच्चो के लिये

जाने किस किस लिये

बेचैन हो जाते है

इतने मदहोश कि

जान न पाते

कब महिला पुरुष बने

लड़के और लडकियॉ

पति पत्नी बनकर

एक दूजे की रखवाली में

जुट जाते है

लड़के और लड़किया

कीचड़ उछाल उछाल कर

कुतो की तरह

लड़ा करते है

लड़के और लड़किया

कभी धन कभी मद

ईंटों, कभी पत्थरों खातिर

लड़ा करते है

यूही पीढ़ी दर पीढ़ी

माता,पिता फिर उनके

बेटा बेटी और फिर..........

लड़ा करते है

युगों युगों से बन

लड़के और लड़किया

पहले बहाना था

अज्ञानी है

अब तुम कॉलेज आए

बदली कहानी है

ज्ञान अर्जन कर सीखे संग संग रहना

लड़के और लड़किया

मौका है अब,कि

खोल ही डाले

भाईचारे की खिडकीयां

इस युग के

लड़के और लड़किया.