यौन शोषण कारण और निवारण
आज जब भी कभी बात चलती है तो तथ्यों पर विचार किये
बिना ही हम कह देते है की
टेम बदलगो ,हवा ही बदलगो
मै पूछती हूँ की टेम बदलगो या हम बदल गये है
समय तो अपनी निर्बाध गति से चलता रहता है उस दिन भी
चल रहा था और आज भी चल रहा है
बदले है तो बस संस्कार !
संस्कार बदले है हमारी अनपढ़ता से ? हम अनपढ़ है ,हाँ
हम सब अनपढ़ है संस्कारो में ,हम सब
अनपढ़ है जीवन मूल्यों में ,हम अनपढ़ है संतोष रखने में
और हम अनपढ़ है अपनी संस्कृति को सहेजने में
हमे सिखाया गया है चंद शब्दों को रटना और पदार्थो के
लिए लड़ना और उसी का परिणाम है ये पथ भ्रष्ट युवा पीढ़ी, उसी का परिणाम है ये यौन
शोषण की घटनाएं, उसी का परिणाम है बड़े बुजर्गो की उपेक्षा और माता पिता का अपमान
इसलिए मै कहती हूँ बाबा टेम नहीं बदलो बदले थे आप लोग
और आप को देख कर बदल रहे है हम और फैलता जा रहा है इस देश में असंतोष क्योकि
वर्तमान पीढ़ी को आप ने छोड़ा है ऐसे दोराहे पर जहाँ रेगिस्तान ही रेगिस्तान है
संस्कारो का, और युवा पीढ़ी दौड़ रही है पानी की खोज में कभी यहाँ कभी वहा !
विदेशियों के चाँद प्याले देखकर शराब के जो नियत बदली
इस देश की उसी का परिणाम है ये आज के पतन ,आज के यौन शोषण क्योकि संस्कारो की अपनी
परम्परा तो पीछे छुट गई है और संस्कार बिना पशु और मानव में क्या अंतर, संस्कार
बिना मानव पशु ही है !
क्या आप में कोई बता सकता है भारतीय संस्क्रती के
सोलह संस्कार कौन कौन से है और यदि नहीं तो फिर क्यों कहते फिरते हो की टेम बदलगो
,क्योकि संस्कार ही भारतीयता की खोज थी क्या आप को पता है हमारे यहाँ सिर्फ मानव
ही मरते है भारतीयता नहीं .
किसी मशहूर शायर ने कहा भी है की
सदियों रहा दुश्मन जमाना हमारा
कुछ है की मिटती नहीं हस्ती हमारी
यह हस्ती ही भारतीयता थी यह हस्ती ही वे संस्कार थे
जो हमे मिटने नहीं दे रहे थे और उन्ही संस्कारो तुमने भुला दिया और हमे सौपा
संस्कार हीन समाज ,जिस समाज को भिन्न भिन्न आक्रमणकारी भी नही मिटे सके थे वह अब
मिट जायेगा .
कहाँ गई वो मर्दानगी जो एक स्त्री की रक्षा न कर सकी
उसके लिए भी स्त्रियों को ही मोर्चा खोलना पड़ा कहाँ गया तुम्हारा कानून ,अब करते
रहना तुम अदालतों में शोर ,और पिटते रहना न्याय के ढोल . मै कहती हूँ की तुम कितने
ही कानून बना डालो पर जब तक संस्कारो की अपनी पुरानी पहचान की और नहीं लौटोगे
अत्याचार यूँ ही बढ़ते रहेंगे .
सोचो जरा क्या इस सब के लिए वे छ: लोग ही दोसी है ,मै
कहती हूँ नहीं
इस सब के लिए दोषी है वे सब लोग जिन्होंने यह माहौल
बनने दिया की झूठ मेव जयते ,अधर्म मेव जयते ,मौज लेना ही जीवन है और इस सबके लिए
दोषी है नीतिया बनाने वाले लोग जिन्होंने विदेशियों के जाने के बाद भी उनकी चूड़ियाँ
पहन रखी है और बना दिया वह माहौल......... की किसी का कुछ नहीं बिगड़ता अब उन लोगो
के पीछे क्यों पड़े हो ?
अरे पड़ना है तो उन के पीछे पडो जो नीतिया बनाते है
,जो इन नीतियों का अनुमोदन करते है और इन नीतियों का अपने लिए मनमाना उपयोग करते
है और पीछे पड़ना है तो उन के पीछे पड़ो जिन्होंने अधर्म को गौरवशाली बना दिया है ,अच्छा बताये जरा आज
कोई पाप करके शर्म महसूस करता है आज तो
ईमानदारी से जीने वाला परेशान है सारे नियम और कानून केवल ईमानदार आदमी का ही खून
निचोड़ते है .
इसलिए लड़ना
है तो अपनी संस्कार हीनता से लड़ो मजबूर करो उन लोगो को जो अधर्म मेव जयते सिद्ध
करने पर तुले है ,बनाओ वे पाठशालाये जहाँ संस्कार जन्म लेते है और जी कर दिखाओ कि
हाँ सत्य का भी स्थान होता जीवन में
,श्रवणकुमार चाहिए तो अंधे होने का भी होसला रखो राम चाहिए तो दशरथ बनना भी सीखो
और सिखाओ .
वर्ना मेरी चेतावनी है की सब बंदूके खरीद लो क्योंकी अभी कुछ नहीं हुआ है असली तांडव तो होना
बाकि है और जिसके घर बन्दूक न होगी उनके घर जिन्दगी भी न होगी.
अब ये सोचना तुम्हारा काम है कि बन्दूक लानी है या
संस्कारो को लाना है.
written by devender for his student to deliver a lecture at republic day celebration 2013
. जयहिन्द