बुधवार, 30 जनवरी 2013

क्यों हो रहा है 

बच्चे बिगड रहे है 
शिकायते आया करती है

अखबार और पत्रिकाए
अक्सर बताया करती है
मनोवैज्ञानिक 
कारण और निवारण दे रहे है
पोथे रचे जा रहे है
पर हल नहीं ढूंढॅ पा रहे है
मै कहता हूँ                          
इसका कोई हल नहीं    
क्योकि अब जीवन सरल नहीं
अब तुम मोम डैड हुए
माता पिता के दर्शन
उनको दुर्लभ हुए
जैसे जैसे भारत में मोम डैड बढते जायेंगे
बच्चे बिगड़ते जायेंगे
विदेशों की तरह एक दिन
अपने यहाँ यही हाल  होगा        
रुपयों से जेब भरी होगी                         
पर  मानव ममता से कंगाल होगा  
बूढी आँखे ताकेंगी
पर बच्चों का अपना जहाँ  होगा
चाहते हो क्या
वो ही बन जाओ
बच्चे चहिये तो
मोम डैड छोड़कर
माता पिता बन जाओ
वर्ना आगे बढ़ो
मत पछताओ मत पछताओ 






खिडकियाँ



बालपन मे कुछ समझ न पाते

लड़के और लडकियॉ

सुनी सुनाई बातों से

अपना मानस बनाते

लड़के और लडकियॉ

नवयौवन मे कदम रखकर

पागल हो जाते है

लड़के और लडकियॉ

विवाह के लिए

फिर बच्चो के लिये

जाने किस किस लिये

बेचैन हो जाते है

इतने मदहोश कि

जान न पाते

कब महिला पुरुष बने

लड़के और लडकियॉ

पति पत्नी बनकर

एक दूजे की रखवाली में

जुट जाते है

लड़के और लड़किया

कीचड़ उछाल उछाल कर

कुतो की तरह

लड़ा करते है

लड़के और लड़किया

कभी धन कभी मद

ईंटों, कभी पत्थरों खातिर

लड़ा करते है

यूही पीढ़ी दर पीढ़ी

माता,पिता फिर उनके

बेटा बेटी और फिर..........

लड़ा करते है

युगों युगों से बन

लड़के और लड़किया

पहले बहाना था

अज्ञानी है

अब तुम कॉलेज आए

बदली कहानी है

ज्ञान अर्जन कर सीखे संग संग रहना

लड़के और लड़किया

मौका है अब,कि

खोल ही डाले

भाईचारे की खिडकीयां

इस युग के

लड़के और लड़किया.





























सह आवास (लिव इन रिलेशनशिप)

प्रिय बंधुओ
आज आधुनिकता एवं पुरातनता में एक युद्ध सा छिड़ा है .एक पक्ष इसे( आधुनिकता) सर्वोतम बताने पर तुला है दूसरा पक्ष पुरातनता को सर्वोतम बताने पर अड़ा है. कुछ अधिक जोशीले लोग नूतन, पुरातन विचारों को लेकर भिड भी पड़ते है.
मेरा अपना मानना है कि लिव इन रिलेशनसिप का विचार पश्चिमी नहीं भारतीय है और आज भी भारत में प्रचलित है.यह परिचायक है उस महान भारतीय सोच का जो व्यक्ति को एक स्वतंत्र इकाई के रूप में देखती है तथा उसकी पसंद एवं नापसंद को सर्वोच्च महत्व देती है.वह प्रतिपादित करती है कि प्रत्येक व्यक्ति कि पसंद एवं नापसंद सर्वोच्च महत्व रखती है एवं किसी के भी भविष्य निर्धारण में उसे ही निसन्देह सर्वोच्च स्थान मिलना ही चाहिए.सह आवास हमें भारत में नया आया लगता है पर ऐसा है नहीं,वरन सत्य तो यह है कि ये पहले भारत में था फिर हमारे शास्त्रों के माध्यम से या हमारी सांस्कृतिक विरासत के रूप में जो लोग यहाँ से पलायन करके गए उनके साथ पश्चिम गया और पश्चिम से पुनःलौटकर भारत आया है.
क्योंकि हमने अध्ययन ,मनन ,ध्यान ,धारणा कि अपनी क्रान्तिकारी आदत छोड़ दी है और कामचोर, चापलूसों कि तरह पश्चिम की पूंछ पकड़ ली और ये मानने लगे है कि उनके विचार ,उनकी शैली हमसे महान है और हारे हुए कुत्ते कि तरह खीसें निपोरकर उनका वर्चस्व स्वीकार कर लेते है और मानने लगते है कि उन्हें ही सोचना आता है ,वरन सच तो यह है कि उन्होंने इस महान विचार एवं क्रांतिकारी सोच के स्वरूप को विकृत कर दिया है,इसकी पवित्रता को भी संदिग्ध कर दिया है.ये उनकी पुराणी आदत है कि जो उनकी समझ में नहीं आता उसे कुरूप कर देते है,उसे कैसे समझा जा सकता है इसका प्रयास नहीं करते. उदहारण के लिए सह आवास कैसे भारतीय है आओ देखें
हमारे यहाँ लुहार,(गाडिया लुहार या महाराणा प्रताप के वंसज के नाम से भी जाने जाते है ) एक जाति होती है जिसे सब जानते है जो हरियाणा राजस्थान में खूब पाई जाती है यह प्रथा आज भी उस जाति में प्रचलित है.विवाह से पहले इस जाति के लोग अपने बच्चों को सहा आवास कि स्थिति में रखते है एवं उन्हें भरपूर मौका देतें है कि वे एक दूसरे को खूब अच्छी तरह देख एवं समझ लें.कौन कितना मेहनती है,विचार मेल खाते है या नहीं,आदि आदि.एक दो वर्ष साथ रखने के बाद लड़की एवं लड़के कि सहमति के बाद ही उनके बुजुर्ग उनका विवाह आगे प्रस्तावित करते है नहीं तो नहीं .
उनके यहाँ लड़के को लड़की के घर रहना पड़ता है इसके पीछे संभवतः यह सोच है कि स्त्री स्वभाव से कोमल एवं बल में कमजोर होती है (अपवाद को छोड़कर ) उसे किसी भी शोषण का शिकार होने से बचाने के लिए ही उसे अपने अभिभावकों के संरक्षण में छोड़ा गया है ताकि शिकायत कि कोई गुंजाईश न बचे .
अब हमारे यहाँ महानगरों में ये विचार आया है पर परिपेक्ष्य बदल गया है .सह आवास का विचार लोगों ने स्वीकार किया है पर शायद स्त्री सुरक्षा का इसमें पुख्ता प्रबंध नहीं है जो शयद कभी किसी पक्ष के पछताने का कारण बने.भारतीय परिपेक्ष्य का सह आवास ही वास्तविक है और शायद हममे से .०१ %लोग ही इस प्रकार के चलन को स्वीकार करें क्योंकि हमें पश्चमी कुरूपता कि आदत पड़ चुकी है और कठोर मेहनती एवं १०० टंच ईमानदार होने का हमारा वह शाश्वत गुण पश्चिम कि संगत के कारण कुरूप हो गया है.ममे से अधिकतर लोग अपनी पसंद के लड़के एवं लड़की से विवाह तो करना चाहते है पर बाहरी दिखावे,फैशन आदि से ही एक दूसरे को समझना चाहते है जो मात्र दिखावा है, लुहार कि तरह एक दूसरे कि जड़ों को समझने को शायद कोई ही तैयार हो जो ऐसा करे समझ लेना सह आवास को समझ रहा है .
महानगरों का सह आवास तो मजबूरी का सह आवास है जो कितना सार्थक है ये तो वो ही बता सकते है जो इस अनुभव से गुजरे है पर एक बात सत्य है कि यह भारतीय विचार है और इस प्रकार उच्चकोटि के विचार भारत ही सोच सकता है युग या समय कोई भी हो ,क्योंकि महान ज्ञान ,महान घटना बुद्धि का प्रसंग नहीं है.यह ध्यानावस्था में योगी पर अवतरित होता है और ध्यान तो सदा सदा से भारत कि आत्मा रहा है.  

छोरियो




वो जमानो पाछै जा लियो
जब आछो पढ़ो लिख्यो दुल्हों थमनै
अनपढ़ हो क भी थैया लियो
घणी पढ़ कै तू नै अपणी
जान नै बीज बो लिया
घर का तेरो दुल्हों ढूँढण मै
माड़ा हो लिया
अब तू अपना मन नै समझाले
जिसा  मिलै ,उसाऽ  वर ले
वर्ना बिन ब्याही रहण की
तैयारी कर ले
तूझ सा पढ़ा लिखा मिलै नहीं
अनपढ़ और कम पढ़े न
तू वरै नहीं, तो फेर के होगा
अपनी समझ मै
या बात बड़ै नहीं
जिंदगी न्यू ही बिताणी पड़ै
के लाडो मन्दर मै
घण्टी बजाणी पड़ै ,वर्ना
तेरो दुल्हों ढूँढण खातिर
घरका नै ग्लोबल होणो पड़ै
जभी तो मै तुनै
पहल्यां समझाऊँ सूँ
आगै के होगो या सिसो
अडवांस मै दिखाऊ सूँ 

क्या शिकायत उनसे
जो कभी हमारे न थे
आंसू तो तब आते है,जब
हमारे होकर भी तुम हमारे नहीं
क्यों सपने बनाते हो की
गुलाम नहीं अब भारत
वर्ना,देशभक्ति का मै अपनी
जलवा दिखा देता
तुझ पर ऐ वतन
अपना सब कुछ लुटा देता
पर मै कहता हूँ की
कुछ भी लुटाने की जरूरत नहीं
तुम बस निर्वाह कर दो
अपने कर्तव्य का
देश स्वर्ग बन जाये
तक्षशिला फिर खिल जाये
मेघदूत शकुंतलम से ग्रन्थ
फिर रचे जाये
उर्वशी को आना ही पड़े फिर
रम्भा को गाना ही पड़े फिर
राणा की कुर्बानी काम आ जायेगी
रोती बहन भगत सिहं की चुप हो जायेगी
हुई जो हालत सुभाष की
भरपाई हो जायेगी  
ओ मेरे देश वासी,सुनकर नहीं देख ही लेना
देश सोने की चिड़िया हो जायेगी
इसलिए क्या मलाल की
गुलाम नहीं अब भारत
देशभक्ति का मै अपनी वर्ना  
जलवा दिखा देता
आओ अपने कर्म का जलवा दिखाए
देश को सोने की चिड़िया बनाये .   


                 यौन शोषण कारण और निवारण
आज जब भी कभी बात चलती है तो तथ्यों पर विचार किये बिना ही हम कह देते है की
टेम बदलगो ,हवा ही बदलगो
मै पूछती हूँ की टेम बदलगो या हम बदल गये है
समय तो अपनी निर्बाध गति से चलता रहता है उस दिन भी चल रहा था और आज भी चल रहा है
बदले है तो बस संस्कार !
संस्कार बदले है हमारी अनपढ़ता से ? हम अनपढ़ है ,हाँ हम सब अनपढ़ है संस्कारो में ,हम सब
अनपढ़ है जीवन मूल्यों में ,हम अनपढ़ है संतोष रखने में और हम अनपढ़ है अपनी संस्कृति को सहेजने में
हमे सिखाया गया है चंद शब्दों को रटना और पदार्थो के लिए लड़ना और उसी का परिणाम है ये पथ भ्रष्ट युवा पीढ़ी, उसी का परिणाम है ये यौन शोषण की घटनाएं, उसी का परिणाम है बड़े बुजर्गो की उपेक्षा और माता पिता का अपमान
इसलिए मै कहती हूँ बाबा टेम नहीं बदलो बदले थे आप लोग और आप को देख कर बदल रहे है हम और फैलता जा रहा है इस देश में असंतोष क्योकि वर्तमान पीढ़ी को आप ने छोड़ा है ऐसे दोराहे पर जहाँ रेगिस्तान ही रेगिस्तान है संस्कारो का, और युवा पीढ़ी दौड़ रही है पानी की खोज में कभी यहाँ कभी वहा !
विदेशियों के चाँद प्याले देखकर शराब के जो नियत बदली इस देश की उसी का परिणाम है ये आज के पतन ,आज के यौन शोषण क्योकि संस्कारो की अपनी परम्परा तो पीछे छुट गई है और संस्कार बिना पशु और मानव में क्या अंतर, संस्कार बिना मानव पशु ही है !
क्या आप में कोई बता सकता है भारतीय संस्क्रती के सोलह संस्कार कौन कौन से है और यदि नहीं तो फिर क्यों कहते फिरते हो की टेम बदलगो ,क्योकि संस्कार ही भारतीयता की खोज थी क्या आप को पता है हमारे यहाँ सिर्फ मानव ही मरते है भारतीयता नहीं .
किसी मशहूर शायर ने कहा भी है की
                     सदियों रहा दुश्मन जमाना हमारा
                     कुछ है की मिटती नहीं हस्ती हमारी
यह हस्ती ही भारतीयता थी यह हस्ती ही वे संस्कार थे जो हमे मिटने नहीं दे रहे थे और उन्ही संस्कारो तुमने भुला दिया और हमे सौपा संस्कार हीन समाज ,जिस समाज को भिन्न भिन्न आक्रमणकारी भी नही मिटे सके थे वह अब मिट जायेगा .
कहाँ गई वो मर्दानगी जो एक स्त्री की रक्षा न कर सकी उसके लिए भी स्त्रियों को ही मोर्चा खोलना पड़ा कहाँ गया तुम्हारा कानून ,अब करते रहना तुम अदालतों में शोर ,और पिटते रहना न्याय के ढोल . मै कहती हूँ की तुम कितने ही कानून बना डालो पर जब तक संस्कारो की अपनी पुरानी पहचान की और नहीं लौटोगे अत्याचार यूँ  ही बढ़ते रहेंगे .
सोचो जरा क्या इस सब के लिए वे छ: लोग ही दोसी है ,मै कहती हूँ नहीं
इस सब के लिए दोषी है वे सब लोग जिन्होंने यह माहौल बनने दिया की झूठ मेव जयते ,अधर्म मेव जयते ,मौज लेना ही जीवन है और इस सबके लिए दोषी है नीतिया बनाने वाले लोग जिन्होंने विदेशियों के जाने के बाद भी उनकी चूड़ियाँ पहन रखी है और बना दिया वह माहौल......... की किसी का कुछ नहीं बिगड़ता अब उन लोगो के पीछे क्यों पड़े हो ?
अरे पड़ना है तो उन के पीछे पडो जो नीतिया बनाते है ,जो इन नीतियों का अनुमोदन करते है और इन नीतियों का अपने लिए मनमाना उपयोग करते है और पीछे पड़ना है तो उन के पीछे पड़ो जिन्होंने अधर्म  को गौरवशाली बना दिया है ,अच्छा बताये जरा आज कोई पाप करके शर्म महसूस करता है  आज तो ईमानदारी से जीने वाला परेशान है सारे नियम और कानून केवल ईमानदार आदमी का ही खून निचोड़ते है .
 इसलिए लड़ना है तो अपनी संस्कार हीनता से लड़ो मजबूर करो उन लोगो को जो अधर्म मेव जयते सिद्ध करने पर तुले है ,बनाओ वे पाठशालाये जहाँ संस्कार जन्म लेते है और जी कर दिखाओ कि हाँ  सत्य का भी स्थान होता जीवन में ,श्रवणकुमार चाहिए तो अंधे होने का भी होसला रखो राम चाहिए तो दशरथ बनना भी सीखो और सिखाओ .
वर्ना मेरी चेतावनी है की सब बंदूके खरीद लो  क्योंकी अभी कुछ नहीं हुआ है असली तांडव तो होना बाकि है और जिसके घर बन्दूक न होगी उनके घर जिन्दगी भी न होगी.
अब ये सोचना तुम्हारा काम है कि बन्दूक लानी है या संस्कारो को लाना है.
written by devender for his student to deliver a lecture at republic day celebration 2013 
                   .                                                                      जयहिन्द  

                   छोरी नया जमाना की

बाबा छोरी सूं मै नया जमाना की
मेरी वैल्यू स लाखां मै
कदे समझ रहयो वा धेला आना की !
तेरा छोरा की हवा काढ दी,
आगै भी काढ दूँगी
आपै मानागो तो ठीक, नहीं तो अपना कामां तै मनवा दूँगी
मेरी वैल्यू स लाखाँ की
कदे समझ रहयो वा धेला आना की
तू मुनै इनकी ढाल उडण दे
यो जैठे पढ़ै स मुन्न भी तू वहीं खिलण दे तेरी आख्यां आगै दिखा दूँगी
मेरी वैल्यू स लाखां की कदे समझ रहयो वा धेला आना की
अपणा छोरा आली छूट जै तू मुन्नै दिवावा
अण स दूणो फायदों कर कै दिखा दूंगी
यो तेरा रुपयां नै उड़ा रहयो स
मै अणनै दूणा बणा दूगी
मेरी वैल्यू स लाखां की कदे .......................
तेरी मोटरसाइकिलनै भगावै सै
अंधाधुंध चलावै ,आपै मरै तूनै रूवावै
तू मुन्नै चलावण  दे
आप स्कूल पहुँचुगी अर
तुनै बाज़ार मै पहुचाँ दूंगी
मेरी वैल्यू स लाखां की
कदे समझ रहयो वा धेला आना की
तू मुन्नै मरवावा एक आध बार अपना छोरा नै
मरवाकै देख
उपराध के छोरी  एकली करै  सै
फेर तू अन्ने बचावा अर ,छोरी कै  कलंक लगावा सा
नींद क्यूँ ना खुल रही तेरी आख्यां की
मेरी वैल्यू स लाखां की
कदे समझ रहयो वा धेला आना की