प्रिय बंधुओ
आज आधुनिकता एवं पुरातनता में एक युद्ध सा छिड़ा है .एक पक्ष इसे( आधुनिकता) सर्वोतम बताने पर तुला है दूसरा पक्ष पुरातनता को सर्वोतम बताने पर अड़ा है. कुछ अधिक जोशीले लोग नूतन, पुरातन विचारों को लेकर भिड भी पड़ते है.
मेरा अपना मानना है कि लिव इन रिलेशनसिप का विचार पश्चिमी नहीं भारतीय है और आज भी भारत में प्रचलित है.यह परिचायक है उस महान भारतीय सोच का जो व्यक्ति को एक स्वतंत्र इकाई के रूप में देखती है तथा उसकी पसंद एवं नापसंद को सर्वोच्च महत्व देती है.वह प्रतिपादित करती है कि प्रत्येक व्यक्ति कि पसंद एवं नापसंद सर्वोच्च महत्व रखती है एवं किसी के भी भविष्य निर्धारण में उसे ही निसन्देह सर्वोच्च स्थान मिलना ही चाहिए.सह आवास हमें भारत में नया आया लगता है पर ऐसा है नहीं,वरन सत्य तो यह है कि ये पहले भारत में था फिर हमारे शास्त्रों के माध्यम से या हमारी सांस्कृतिक विरासत के रूप में जो लोग यहाँ से पलायन करके गए उनके साथ पश्चिम गया और पश्चिम से पुनःलौटकर भारत आया है.
क्योंकि हमने अध्ययन ,मनन ,ध्यान ,धारणा कि अपनी क्रान्तिकारी आदत छोड़ दी है और कामचोर, चापलूसों कि तरह पश्चिम की पूंछ पकड़ ली और ये मानने लगे है कि उनके विचार ,उनकी शैली हमसे महान है और हारे हुए कुत्ते कि तरह खीसें निपोरकर उनका वर्चस्व स्वीकार कर लेते है और मानने लगते है कि उन्हें ही सोचना आता है ,वरन सच तो यह है कि उन्होंने इस महान विचार एवं क्रांतिकारी सोच के स्वरूप को विकृत कर दिया है,इसकी पवित्रता को भी संदिग्ध कर दिया है.ये उनकी पुराणी आदत है कि जो उनकी समझ में नहीं आता उसे कुरूप कर देते है,उसे कैसे समझा जा सकता है इसका प्रयास नहीं करते. उदहारण के लिए सह आवास कैसे भारतीय है आओ देखें
हमारे यहाँ लुहार,(गाडिया लुहार या महाराणा प्रताप के वंसज के नाम से भी जाने जाते है ) एक जाति होती है जिसे सब जानते है जो हरियाणा राजस्थान में खूब पाई जाती है यह प्रथा आज भी उस जाति में प्रचलित है.विवाह से पहले इस जाति के लोग अपने बच्चों को सहा आवास कि स्थिति में रखते है एवं उन्हें भरपूर मौका देतें है कि वे एक दूसरे को खूब अच्छी तरह देख एवं समझ लें.कौन कितना मेहनती है,विचार मेल खाते है या नहीं,आदि आदि.एक दो वर्ष साथ रखने के बाद लड़की एवं लड़के कि सहमति के बाद ही उनके बुजुर्ग उनका विवाह आगे प्रस्तावित करते है नहीं तो नहीं .
उनके यहाँ लड़के को लड़की के घर रहना पड़ता है इसके पीछे संभवतः यह सोच है कि स्त्री स्वभाव से कोमल एवं बल में कमजोर होती है (अपवाद को छोड़कर ) उसे किसी भी शोषण का शिकार होने से बचाने के लिए ही उसे अपने अभिभावकों के संरक्षण में छोड़ा गया है ताकि शिकायत कि कोई गुंजाईश न बचे .
अब हमारे यहाँ महानगरों में ये विचार आया है पर परिपेक्ष्य बदल गया है .सह आवास का विचार लोगों ने स्वीकार किया है पर शायद स्त्री सुरक्षा का इसमें पुख्ता प्रबंध नहीं है जो शयद कभी किसी पक्ष के पछताने का कारण बने.भारतीय परिपेक्ष्य का सह आवास ही वास्तविक है और शायद हममे से ०.०१ %लोग ही इस प्रकार के चलन को स्वीकार करें क्योंकि हमें पश्चमी कुरूपता कि आदत पड़ चुकी है और कठोर मेहनती एवं १०० टंच ईमानदार होने का हमारा वह शाश्वत गुण पश्चिम कि संगत के कारण कुरूप हो गया है.हममे से अधिकतर लोग अपनी पसंद के लड़के एवं लड़की से विवाह तो करना चाहते है पर बाहरी दिखावे,फैशन आदि से ही एक दूसरे को समझना चाहते है जो मात्र दिखावा है, लुहार कि तरह एक दूसरे कि जड़ों को समझने को शायद कोई ही तैयार हो जो ऐसा करे समझ लेना सह आवास को समझ रहा है .
महानगरों का सह आवास तो मजबूरी का सह आवास है जो कितना सार्थक है ये तो वो ही बता सकते है जो इस अनुभव से गुजरे है पर एक बात सत्य है कि यह भारतीय विचार है और इस प्रकार उच्चकोटि के विचार भारत ही सोच सकता है युग या समय कोई भी हो ,क्योंकि महान ज्ञान ,महान घटना बुद्धि का प्रसंग नहीं है.यह ध्यानावस्था में योगी पर अवतरित होता है और ध्यान तो सदा सदा से भारत कि आत्मा रहा है.

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें