अक्सर माए चाहती है की
उनकी पुत्री की हर चाह का
मान सम्मान हो
ससुराल में पूरे,उसके सब अरमान हो.
अक्सर माए चाहती है की
ससुराल में उसकी,एक पहचान हो
अधिकारों से संपन्न
उसके हाथ घर की कमान हो
सब उसके आज्ञाकारी और
घर स्वर्ग समान हो.
अक्सर माए पुत्री को सिखाया करती है
अपने हक के लिए लड़ना कैसे
बताया करती है
क्या चल रहा बेटी के घर
ख़बरें मंगाया करती है.
अक्सर माए,घर आने पर दामाद के
बेटी के पक्ष में
दलीले गिनाया करती है
उसके कुनबे में कौन अच्छा
कौन खराब,उसे बैठकर बताया करती है
उसके अधिकार गिनाया करती है.
अक्सर माए वही अधिकार
बहुओं को देने में कतराया करती है
बहुएँ ही बेटी है,माए
ये बात भुलाया करती है
माए बहुओं पर
दमनचक्र चलाया करती है.
काश की माएं
बहुओं को बेटियां बनाएं
तो बेटी को सिखाना न पड़े
दामाद को समझाना न पड़े
अपने आप मिट जाये
दुनिया के झगड़े .


