मंगलवार, 29 मार्च 2011

दुनिया के झगड़े


अक्सर माए चाहती है की
उनकी पुत्री की हर चाह का
मान सम्मान हो
ससुराल में पूरे,उसके सब अरमान हो.
अक्सर माए चाहती है की
ससुराल में उसकी,एक पहचान हो
अधिकारों से संपन्न
उसके हाथ घर की कमान हो
सब उसके आज्ञाकारी और
घर स्वर्ग समान हो.
अक्सर माए पुत्री को सिखाया करती है
 अपने हक के लिए लड़ना कैसे
बताया करती है
क्या चल रहा बेटी के घर
ख़बरें मंगाया करती है.
अक्सर माए,घर आने पर दामाद के
बेटी के पक्ष में
दलीले गिनाया करती है
उसके कुनबे में कौन अच्छा
कौन खराब,उसे बैठकर बताया करती है
उसके अधिकार गिनाया करती है.
अक्सर माए वही अधिकार
बहुओं को देने में कतराया करती है
बहुएँ ही बेटी है,माए
ये बात भुलाया करती है
माए बहुओं पर
दमनचक्र चलाया करती है.
काश की माएं
बहुओं को बेटियां बनाएं
तो बेटी को सिखाना न पड़े
दामाद को समझाना न पड़े
अपने आप मिट जाये
दुनिया के झगड़े . 

कितने ही प्रयत्न करें



कितने ही प्रयत्न करे चाहे
माता पिता,दादा दादी,नाना नानी
या दूसरे रिश्ते नाती
कितने ही प्रयत्न करे चाहे  
शिक्षक या समाज,पंचायते या खाप
संगठन और मठ
पर दुनिया में शांति न होगी
कितने ही प्रयत्न करे चाहे
शास्त्री और शास्त्र,अस्त्र चाहे सस्त्र
पहने चाहे मानव,नित्य भगवा वस्त्र
कितने ही प्रयत्न करे चाहे
ब्रह्मा और ब्रहामण,नाना योनिया और देवगण
कवि और कविताएँ,या बहती सरिताए
पर दुनिया में ........................
कितने ही प्रयत्न करे चाहे
राग,रागनियाँ या सत्संग कीर्तन
कितनी ही रच डालो चाहे रामायण
या रचा डालो नित महाभारत
जोड़ लो या तोड़ लो
कितने ही अणु और परमाणु
पर दुनिया में ..................................
कितने ही प्रयत्न करे चाहे
विज्ञानी और मनोविज्ञानी
कर डाले जितने चाहे शोध
लिख डालो कोई सा भी वाद
खत्म नहीं होगा पर दुनिया से परिवाद
ले लो जिसका चाहो आशीर्वाद
पर दुनिया में ..........................
पंच विकारों से घिरा है मानव जब तक
कितने ही प्रयत्न करो उस दिन तक
पंच विकार मिल जाते है यू मन में
जैसे मिले दूध जल में
पंच विकारों से हटे बिना
कोई क्रांति न होगी
पंच विकारों से हटे बिना शांति न होगी


भारतीय शास्त्रों में झगड़े का मूल कारण (काम,क्रोध,लोभ मोह,अहं )बताया गया है .हम देखते भी है की हर झगड़े की जड ये अवगुण ही है इसलिए सचमुच शांति चाहिए तो हमारे देश ने अशांति के मूल कारकों को खोजा है और उनसे बचने के उपाय बताये है .जो चाहिए वो ले लो शांति या अशांति फैसला आपका.


   

शुक्रवार, 25 मार्च 2011

धोती


धोती
 जब हम पहना करते धोती
तब मन भी उसकी तरह
सरल था ,सपाट था
अपना देश तब दुनिया का गौरव था .
ज्यों ज्यों आती गयी
सिलाई वाली पैंट
हमारा मन बनता गया टैंट
वर्ना पहले इसका फलक
धोती कि तरह विशाल था .
जैसे जैसे रंगों में आती गई
कमीज और पैंट
वैसा ही रंगीला होता गया मन
वर्ना पहले धोती कि तरह
सफ़ेद झक हुआ करता
सत्यम शिवम सुन्दरम
यही बस रटा करता .
जब से आई है जींस टाइट
बढ़ गई इसके अरमानो कि हाईट
दौड़ता रहता है डे और नाईट
धोती के दिनों में चला करता दिन में
और चैन से सोया करता रत भर .
सोचा था सील कर कपडे
ज्यादा तन ढक पायंगे
पर क्या पाता था ,ये पारदर्शी हो जायंगे
तन के साथ साथ
मन को भी नंगा कर जायंगे
क्योंकि
शरीर के नंगा होने से क्या है
मन का नंगापन ही असल नंगापन है
और ,धोती के दिनों में
टाँगे  नंगी थी पर मन गंगा था.
धोती पहना करते हम
तन ढकने खातिर
अब हम कपड़े पहना करते है
अंगों कि नुमाइश खातिर
पहले कपड़े उतार देते थे लोग
बुद्ध होकर ,महावीर होकर
अब उतार देते है पैसे लेकर .
युवावर्ग फिर अनुसरण करता हो जायेगा
मुफ्त में अपना नंगापन बढ़ाएगा
अपनी संस्कृति को हीन
उनकी को श्रेष्ठ बताएगा
                         देवेन्द्र कुमार
           

गुरुवार, 24 मार्च 2011

भारत का ज्ञान


हर वर्ष स्कूल कालेजों में दाखिले के समय विभिन्न अखबार अभिभावकों को सलाह देतें है कि बच्चों को अपना दोस्त बनायें ,उनसे दोस्ताना व्यवहार करें ...,ऐसा करें वैसा करें .
मनोविज्ञान के गहरे और उथले सूत्र अभिभावकों को समझाए जाते है ,पता नहीं इन अखबार वालो को पन्ने भरने का चाव है या सचमुच आज कि पढ़ी लिखी पीढ़ी अनपढ़ हो गई है या पश्चिम से आये हमारे विचारों को हम पर ही थोपने की होड लगी है .पता नहीं भारतीय युवा एवं प्रोढो को अपने भारतीय होने पर क्यों शर्म आने लगी है जो अपनी संस्कृति को एक बार भी मुड़कर नहीं देखते .
कमाल की बात यह है की हमारी निरक्षर पीढ़ी जिस बात को जानती थी वह आज की साक्षर पीढ़ी नहीं जानती .जो अनपढ़ आदमी सरल शब्दों में समझा रहा है हम उसकी और ध्यान नहीं देते सभी अखबार ,पत्रिकाएं तथा अन्य संचार के साधन शोर मचा रहे है की अपने युवा बच्चों को दोस्त बनाये जबकि ये ज्ञान हमारे खून में ही बसा है .जो लोग ग्रामीण रहन सहन ,संस्कृति से परिचित है वे जानते है की बड़े बच्चों को माता पिता बेटा या बेटी नहीं कहते है वे उन्हें सदा भाई या जीजी कहतें है जरा सा इस और ध्यान दें तो आप सब को यद् आ जायेगा ,क्योंकि आप सब कभी न कभी तो ग्रामीण रहे होंगे या ग्रामीण संस्कृति से परिचित रहे होंगे .आप को याद होगा की कब आपके माता पिता ने आप को बेटा ,बेटी कहना छोड़ दिया था जब से आप जवान हुए है अपने आप ही वे तुम्हें भाई या जीजी कहने लगे है .अर्थात जब से उनका संबोधन  बदला है ,उन्होंने जवान बच्चों को अपना दोस्त घोषित कर दिया है ,बिना कहे ,बिना सिखाए ,बिना मनोविज्ञान पढ़े .
अब तुम नहीं समझ पाओ तो क्या करें .तुम उनके झुक जाने को न समझो तो उनकी क्या गलती है जवानों,युवाओं,और प्रोढों से मै कहना चाहता हूँ की हमारी संस्कृति इशारों की संस्कृति रही है ,इसलिए माता ,पिता भाई बहन ,तथा अन्य रिश्तेदार क्या व्यवहार कर रहें है उसे जरा सूक्ष्मता से अनुभव करते रहा करो .हमारे यहाँ ऐसा वर्षों से चलता आ रहा है ,और एक तुम हो की खून में बसी संस्कृति को भी अखबारों से सिखने पर तुले हो, अरे पीछे मुड़ो और देखो अपनी संस्कृति के इशारों ,संबोधनो की और ध्यान दो .हमारी संस्कृति को गाँवो ने आज भी जिन्दा रखा है शहरों ने नहीं .भारत आज भी गाँवो में बसता है शहरों में नहीं .
हमारी संस्कृतिबड़े सूक्ष्म इशारे करती है जो हमारे अंदर बसा है उसे औरों के यहाँ से क्यों ढूंढे ,औरो से सिर्फ वो ले जो हमारे यहाँ नहीं .भारतीय संस्कृति तो सदा से कहती है की जब बाप की जूती बेटे के पैरों में आने लगे तो उसे अपना दोस्त समझो .उसी से प्रेरित होकर माता पिता नौजवानों,के प्रति अपना संबोधन बदल देते है
तो आओ अपनी संस्कृति पर गर्व करें और इसके महान विचारों का अनुशरण करें ऐसे पता नहीं कितने गहरे मनोविज्ञानहमारे यहाँ भरे पड़े है   

बुधवार, 23 मार्च 2011


चीथड़े है
वे कपड़े ,जो थे तुम्हें
अति प्रिय आज चीथड़े
पड़े है शायद कहीं थेकले (पैबंद )बनकर.
कल जिनके गंदे होने पर
बहुत होता था मलाल
जिनके फट जाने पर
निकल ही जाती थी तुम्हारी जान
आज चीथड़े ................!
वे कपड़े जिन्हें पहनकर
तुम संवर जाते थे
बहुत खुश होते और इतराते थे
जिन्हें पहनकर, तुम्हारा सीना
गर्व से चोड़ा हो जाता था
आज चीथड़े है ........!
जिनके दाम पूछने में लोग हिचकिचाते थे
उनके छिन जाने पर
जार जार आंसू बहाते थे
 उन पर पड़ने वाली सिलवटें उन पर नहीं
 तुम्हारे दिल पर पड़ती थी
आज चीथड़े है ..............!
वे कपड़े जिन्हे तुम कई दिन
रहे छाती से चिपकाये
जिनके लिए भाई से लड़े
और बहन पर हाथ उठाये
जिन्हे पहन दोस्तों में इतराए
आज चीथड़े है .............!
इसी तरह तुम्हारे अंदर का जीव
आज नया है ,
कल चीथड़े चीथड़े हो जायेगा
इस पर कालिख जमती जायेगी
दुनिया का कोई साबुन धो न पायेगा
तुम ढूंडते फिरोगे वह साबुन
जो तुम्हे उजला कर दे .
ऐसा उजला कि
लोग दाग ढूंढते रह जायें
उस दिन कहीं न जाना
भारत कि और मुड़ना
भारतीयता कि और मुड़ना
हमने चिथडो से
कपड़े बनाना सीखा है
कपड़ो से चीथड़े नहीं
पर सावधान कहीं देर न हो जाये .
  



  उल्हाना                                 
माएं उल्हाना देती है कि
हमने नहीं खाया अच्छा
ताकि तुम खा  सको
माएं उल्हाना देती है कि
 हमने नहीं पहना अच्छा
ताकि तुम पहन सको
माएं उल्हाना देती है कि
हम कमाए टूट कर
ताकि तुम्हे परेशानी न हो
माएं उल्हाना देती है कि
हम लड़े जेठ देवरों से
ताकि तुम्हारा शोषण न हो
माएं उल्हाना देती है कि
हमने देखे दिन दुखियारे
ताकि तुम न देख सको
माएं उल्हाना देती है कि
हम जगे रात भर
ताकि तुम सो सको
माएं उल्हाना देती है कि
हमने जोड़ी पूंजी ,खेत खलिहान और पैसा
ताकि तुम अमीर बन सको
और भी जाने क्या क्या उल्हाना देती है माएं
माएं उल्हाना देती है कि
हमें नहीं पता था कि
ऐसा होगा तू ,वैसा होगा तू
हमें नहीं पता था कि
हमारी नहीं ,बहु कि सुनेगा तू
माएं उल्हाना देती है कि
क्या पता था कि गुलाम होगा तू
फिर पछता कर ,आहें भर कहती है माँ
बेटा तो लायक है पर बहू नालायक है
माँ पर भूल जाती है कि
जो तूने किया ,बहू वही तो कर रही है
तूने सपने गढे
अपनी औलाद के लिए
बहू सपने गढ़ रही है
अपनी औलाद के लिए
अपनी राह के रोड़े तूने फ़ेंक दिए
अब बहू
अपनी राह के रोड़े फ़ेंक रही है
मेरा कहना है कि माँ
इन सब कि बजाय
तुम बस मिल बाँट कर खाना सीख जाती
तो ,न हम पछताते
न तू पछताती