बुधवार, 23 मार्च 2011


चीथड़े है
वे कपड़े ,जो थे तुम्हें
अति प्रिय आज चीथड़े
पड़े है शायद कहीं थेकले (पैबंद )बनकर.
कल जिनके गंदे होने पर
बहुत होता था मलाल
जिनके फट जाने पर
निकल ही जाती थी तुम्हारी जान
आज चीथड़े ................!
वे कपड़े जिन्हें पहनकर
तुम संवर जाते थे
बहुत खुश होते और इतराते थे
जिन्हें पहनकर, तुम्हारा सीना
गर्व से चोड़ा हो जाता था
आज चीथड़े है ........!
जिनके दाम पूछने में लोग हिचकिचाते थे
उनके छिन जाने पर
जार जार आंसू बहाते थे
 उन पर पड़ने वाली सिलवटें उन पर नहीं
 तुम्हारे दिल पर पड़ती थी
आज चीथड़े है ..............!
वे कपड़े जिन्हे तुम कई दिन
रहे छाती से चिपकाये
जिनके लिए भाई से लड़े
और बहन पर हाथ उठाये
जिन्हे पहन दोस्तों में इतराए
आज चीथड़े है .............!
इसी तरह तुम्हारे अंदर का जीव
आज नया है ,
कल चीथड़े चीथड़े हो जायेगा
इस पर कालिख जमती जायेगी
दुनिया का कोई साबुन धो न पायेगा
तुम ढूंडते फिरोगे वह साबुन
जो तुम्हे उजला कर दे .
ऐसा उजला कि
लोग दाग ढूंढते रह जायें
उस दिन कहीं न जाना
भारत कि और मुड़ना
भारतीयता कि और मुड़ना
हमने चिथडो से
कपड़े बनाना सीखा है
कपड़ो से चीथड़े नहीं
पर सावधान कहीं देर न हो जाये .
  


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