हर वर्ष स्कूल कालेजों में दाखिले के समय विभिन्न अखबार अभिभावकों को सलाह देतें है कि बच्चों को अपना दोस्त बनायें ,उनसे दोस्ताना व्यवहार करें ...,ऐसा करें वैसा करें .
मनोविज्ञान के गहरे और उथले सूत्र अभिभावकों को समझाए जाते है ,पता नहीं इन अखबार वालो को पन्ने भरने का चाव है या सचमुच आज कि पढ़ी लिखी पीढ़ी अनपढ़ हो गई है या पश्चिम से आये हमारे विचारों को हम पर ही थोपने की होड लगी है .पता नहीं भारतीय युवा एवं प्रोढो को अपने भारतीय होने पर क्यों शर्म आने लगी है जो अपनी संस्कृति को एक बार भी मुड़कर नहीं देखते .
कमाल की बात यह है की हमारी निरक्षर पीढ़ी जिस बात को जानती थी वह आज की साक्षर पीढ़ी नहीं जानती .जो अनपढ़ आदमी सरल शब्दों में समझा रहा है हम उसकी और ध्यान नहीं देते सभी अखबार ,पत्रिकाएं तथा अन्य संचार के साधन शोर मचा रहे है की अपने युवा बच्चों को दोस्त बनाये जबकि ये ज्ञान हमारे खून में ही बसा है .जो लोग ग्रामीण रहन सहन ,संस्कृति से परिचित है वे जानते है की बड़े बच्चों को माता पिता बेटा या बेटी नहीं कहते है वे उन्हें सदा भाई या जीजी कहतें है जरा सा इस और ध्यान दें तो आप सब को यद् आ जायेगा ,क्योंकि आप सब कभी न कभी तो ग्रामीण रहे होंगे या ग्रामीण संस्कृति से परिचित रहे होंगे .आप को याद होगा की कब आपके माता पिता ने आप को बेटा ,बेटी कहना छोड़ दिया था जब से आप जवान हुए है अपने आप ही वे तुम्हें भाई या जीजी कहने लगे है .अर्थात जब से उनका संबोधन बदला है ,उन्होंने जवान बच्चों को अपना दोस्त घोषित कर दिया है ,बिना कहे ,बिना सिखाए ,बिना मनोविज्ञान पढ़े .
अब तुम नहीं समझ पाओ तो क्या करें .तुम उनके झुक जाने को न समझो तो उनकी क्या गलती है जवानों,युवाओं,और प्रोढों से मै कहना चाहता हूँ की हमारी संस्कृति इशारों की संस्कृति रही है ,इसलिए माता ,पिता भाई बहन ,तथा अन्य रिश्तेदार क्या व्यवहार कर रहें है उसे जरा सूक्ष्मता से अनुभव करते रहा करो .हमारे यहाँ ऐसा वर्षों से चलता आ रहा है ,और एक तुम हो की खून में बसी संस्कृति को भी अखबारों से सिखने पर तुले हो, अरे पीछे मुड़ो और देखो अपनी संस्कृति के इशारों ,संबोधनो की और ध्यान दो .हमारी संस्कृति को गाँवो ने आज भी जिन्दा रखा है शहरों ने नहीं .भारत आज भी गाँवो में बसता है शहरों में नहीं .
हमारी संस्कृतिबड़े सूक्ष्म इशारे करती है जो हमारे अंदर बसा है उसे औरों के यहाँ से क्यों ढूंढे ,औरो से सिर्फ वो ले जो हमारे यहाँ नहीं .भारतीय संस्कृति तो सदा से कहती है की जब बाप की जूती बेटे के पैरों में आने लगे तो उसे अपना दोस्त समझो .उसी से प्रेरित होकर माता पिता नौजवानों,के प्रति अपना संबोधन बदल देते है
तो आओ अपनी संस्कृति पर गर्व करें और इसके महान विचारों का अनुशरण करें ऐसे पता नहीं कितने गहरे मनोविज्ञानहमारे यहाँ भरे पड़े है

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