शुक्रवार, 25 मार्च 2011

धोती


धोती
 जब हम पहना करते धोती
तब मन भी उसकी तरह
सरल था ,सपाट था
अपना देश तब दुनिया का गौरव था .
ज्यों ज्यों आती गयी
सिलाई वाली पैंट
हमारा मन बनता गया टैंट
वर्ना पहले इसका फलक
धोती कि तरह विशाल था .
जैसे जैसे रंगों में आती गई
कमीज और पैंट
वैसा ही रंगीला होता गया मन
वर्ना पहले धोती कि तरह
सफ़ेद झक हुआ करता
सत्यम शिवम सुन्दरम
यही बस रटा करता .
जब से आई है जींस टाइट
बढ़ गई इसके अरमानो कि हाईट
दौड़ता रहता है डे और नाईट
धोती के दिनों में चला करता दिन में
और चैन से सोया करता रत भर .
सोचा था सील कर कपडे
ज्यादा तन ढक पायंगे
पर क्या पाता था ,ये पारदर्शी हो जायंगे
तन के साथ साथ
मन को भी नंगा कर जायंगे
क्योंकि
शरीर के नंगा होने से क्या है
मन का नंगापन ही असल नंगापन है
और ,धोती के दिनों में
टाँगे  नंगी थी पर मन गंगा था.
धोती पहना करते हम
तन ढकने खातिर
अब हम कपड़े पहना करते है
अंगों कि नुमाइश खातिर
पहले कपड़े उतार देते थे लोग
बुद्ध होकर ,महावीर होकर
अब उतार देते है पैसे लेकर .
युवावर्ग फिर अनुसरण करता हो जायेगा
मुफ्त में अपना नंगापन बढ़ाएगा
अपनी संस्कृति को हीन
उनकी को श्रेष्ठ बताएगा
                         देवेन्द्र कुमार
           

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