मंगलवार, 15 मार्च 2011


क्यों बेचैन है

पाकर भी
माता पिता धन दौलत
पति, पत्नी , बेटा ,बेटी
पत्थर, पहाड़ ,गाड़ी ,लड्ढा और पदार्थ
क्यों तू ,बेचैन है ?
खोकर भी, माता ,पिता
पति ,पत्नी बेटा ,बेटी
गाड़ी ,लड्ढा ,धन ,दौलत
और पदार्थ
क्यों तू बेचैन है ?
होकर भी अनाथ
या पाकर भी अपने लिए
कई कई नाथ
क्यों तू बेचैन है ?
नादान रहकर भी
या सयाना होकर भी
अनपढ़ रहकर भी
या पी॰एच॰ डी॰ बनकर भी
भूखा रहकर भी
या मणो मण खाकर भी
क्यों तू बेचैन है ?
भारतीय संस्कृति ने 
किया विचार
उत्तर देने को आए
ऋषिवर बारम्बार
ऋषिवर ने बतलाया
बच्चा एक गुदा ,एक लिंग एक मुंह ,दो नासिकाए, दो आंख, दो कान और
एक सहस्रासर
अपनी देह के है
ये दस द्वार ,
नौ माँ के गर्भ से
खुले आते  
दसवे का विधान
सदगुरु आन बताते
उस आनंद को तो
सृष्टि में
बस वही दिखाते !
विश्वास नहीं तो
नौ द्वारो में से 
कोई एक खुला दवार
बंद कर देख लो
बेचैनी समझ आ जायेगी
ऋषियो की बात
प्रत्यक्ष नज़र आयेगी !
इनके बंद होने की बेचैनी
देह को कष्ट पहुंचाती है
उसके (सहस्रासर )बंद होने की बेचैनी
आत्मा को कष्ट पहुंचाती है
इसलिए कह गए
अपने ऋषिवर
कुछ भी खा लेना
कुछ भी पा लेना
नहीं खोलोगे दसम दवार जब तक
बेचनी नहीं मिटेगी तब तक
कह गये ऋषिवर 
इसे खोलना है तो
विवेकनन्द को सुनो
दयानन्द को चुनो
हर कम मे
इतनी बुदधि लगाते हो
थोड़ी बुदधि लगाकर
गुरुवर को सुनो
चुनना है तो
उनके चरणों को चुनो
  

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