बुधवार, 23 मार्च 2011


  उल्हाना                                 
माएं उल्हाना देती है कि
हमने नहीं खाया अच्छा
ताकि तुम खा  सको
माएं उल्हाना देती है कि
 हमने नहीं पहना अच्छा
ताकि तुम पहन सको
माएं उल्हाना देती है कि
हम कमाए टूट कर
ताकि तुम्हे परेशानी न हो
माएं उल्हाना देती है कि
हम लड़े जेठ देवरों से
ताकि तुम्हारा शोषण न हो
माएं उल्हाना देती है कि
हमने देखे दिन दुखियारे
ताकि तुम न देख सको
माएं उल्हाना देती है कि
हम जगे रात भर
ताकि तुम सो सको
माएं उल्हाना देती है कि
हमने जोड़ी पूंजी ,खेत खलिहान और पैसा
ताकि तुम अमीर बन सको
और भी जाने क्या क्या उल्हाना देती है माएं
माएं उल्हाना देती है कि
हमें नहीं पता था कि
ऐसा होगा तू ,वैसा होगा तू
हमें नहीं पता था कि
हमारी नहीं ,बहु कि सुनेगा तू
माएं उल्हाना देती है कि
क्या पता था कि गुलाम होगा तू
फिर पछता कर ,आहें भर कहती है माँ
बेटा तो लायक है पर बहू नालायक है
माँ पर भूल जाती है कि
जो तूने किया ,बहू वही तो कर रही है
तूने सपने गढे
अपनी औलाद के लिए
बहू सपने गढ़ रही है
अपनी औलाद के लिए
अपनी राह के रोड़े तूने फ़ेंक दिए
अब बहू
अपनी राह के रोड़े फ़ेंक रही है
मेरा कहना है कि माँ
इन सब कि बजाय
तुम बस मिल बाँट कर खाना सीख जाती
तो ,न हम पछताते
न तू पछताती  

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