सदियों से
ब्याही गई है लड़कियां
जमीनों को ,मूछों को
अहंकारो को ,महलों को
सजे धजे सोने के पिंजरों को
नौकरियो को व्यवसायों को
या
धनागम के नित नये स्रोतों को.
एक आध बार ब्याही गई है किसी पुरुष को
जानती है कब
विदयाअध्यन से
विभिन्न आयामों छुआ तब
अपने जनकों को स्थिरत्व का
विश्वास दिलाया तब
सावित्री सा अधिकार चाहती है तो
पढ़ आगे बढ़
पी॰एच॰डी कर ,विदुषी बन
जला डाल, तृष्णाओं का वन
वर्ना होता रहेगा
तेरे अधिकारों कि आहुतियों से हवन.
देवेन्द्र कुमार
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